समाजशास्त्र की परिभाषा तथा सिद्धांत Definition and Principles of Sociology

समाजशास्त्र की परिभाषा तथा सिद्धांत Definition and Principles of Sociology

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख समाजशास्त्र की परिभाषा तथा सिद्धांत (Definition and Principles of Sociology) में। दोस्तों इस लेख के माध्यम से

आप समाजशास्त्र किसे कहते हैं? समाजशास्त्र के जनक, समाजशास्त्र का अर्थ, तथा समाजशास्त्र की सीमाएँ पड़ेंगे। तो आइये शुरू करते है, यह लेख समाजशास्त्र की परिभाषा तथा सिद्धांत:-

समाजशास्त्र की परिभाषा तथा सिद्धांत


समाजशास्त्र किसे कहते हैं what is Sociology

जैसे-जैसे पृथ्वी पर सभ्यता का विकास हुआ तो मनुष्य ने जंगलों से निकल कर एक साथ रहना शुरू कर दिया तथा प्रगति पर भी उनका नियंत्रण बढ़ना शुरू हो गया।

वहीं दूसरी ओर धीरे-धीरे मनुष्य एक साथ रहने लग गया और उनमें सामाजिक संबंध स्थापित होते गए और समाज का विकास प्रारंभ हो गया।

विकास की गति तीव्र होती गई और सामाजिक संरचना और व्यवस्थाओं में भी तीव्रता देखने को मिली। परिणाम स्वरूप सामाजिक विज्ञानों की उन्नति करने के लिए बात किया अर्थशास्त्र राजनीति शास्त्र मनोविज्ञान

ऐसे विज्ञान थे जो कि सामाजिक विषय के एक विशिष्ट पक्ष का अध्ययन करते थे, इसीलिए इन सभी अस्त व्यस्त विषयों के अध्ययन के लिए समाज का समस्त अध्ययन संभव न था और इसीलिए फ्रांसीसी विद्वान अगस्त काम्टे ने समाज का विस्तृत अध्ययन किया

और उसे एक शाखा के रूप में समाजशास्त्र या सोशियोलॉजी (Sociology) का नाम प्रदान किया। अगस्त कॉमटे (August Comte) ने समाजशास्त्र के बारे में यह भी लिखा है, कि समाजशास्त्र अन्य विद्वानों को एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है और उनके आपसी संबंधों का भी निर्णय करता है।


समाजशास्त्र के जनक Father of sociology 

सामाजशास्त्र का जनक अगस्त कॉमटे (August Comte) को माना जाता है, कियोकि उन्होंने ही सामाजशास्त्र को एक विषय के रूप में प्रतिपादित किया है। अगस्त काम्टे ने विज्ञानों की एक श्रंखला सी बनाई उसने इस क्रम में समाजशास्त्र को सबसे प्रमुख स्थान दिया और कहा कि

  1. समाजशास्त्र एक व्यापक विज्ञान है
  2. समाजशास्त्र सभी विज्ञानो का समन्वय है
  3. समाजशास्त्र का प्रयोग सामाजिक पुनर्निर्माण में होना चाहिए

इस दृष्टि से कॉमटे ने समाजशास्त्र को विज्ञानों की श्रेणी में सबसे प्रमुख और शीर्षस्थ उत्तराधिकारी ठहराया। अगस्त कॉमटे ने ही समाज के वैज्ञानिक अध्ययन की कल्पना की इसीलिए उसको समाजशास्त्र का जन्मदाता भी माना जाता है। इसके अतिरिक्त अगस्त काम्टे ने एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह भी कहीं की समाजशास्त्र का उपयोग समाज के पुनर्निर्माण में होना चाहिए।

इंग्लैंड में समाजशास्त्र का जनक हरबर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) को माना जाता है, उन्होंने समाजशास्त्र को एक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया था और इसे पूरी तरह शास्त्र की संज्ञा भी प्रदान की थी। स्पेंसर महोदय ने समाज के संदर्भ में समाज के सावयवी सिद्धांत, विकासवादी सिद्धांत, सामाजिक डार्विनवाद की विचारधारा का प्रतिपादन किया।

अमेरिका में समाजशास्त्र के जनक लेफ्टर एफ.वार्ड को (left f.ward) माना जाता है, लेफ्टर एफ.वार्ड ने स्पेंसर के मत को भी स्वीकार किया है। इसके साथ ही उन्होंने दो इन्हीं बातों की और सभी का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा है,

कि मनुष्यों का जो विकास होता है वह पूर्ण रूप से प्रकृति पर आधारित होता है। पशुओं में बुद्धि नहीं होती है, इसीलिए वे अपने विकास के लिए पूरी तरह से प्रकृति पर आधारित माने जाते हैं।

इसी तरह वार्ड ने मानव के विकास के संबंध में यह व्यक्त किया था, कि पशु एवं मानव विकास में यह अंतर हो जाना चाहिए कि मानो अपने विकास के लिए पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर नहीं है। वह अपने विकास में स्वयं हिस्सा ले सकता है। वार्ड महोदय ने समाजशास्त्र को दो भागों में बांटा है:- 

  1. शुद्ध समाजशास्त्र :- शुद्ध समाजशास्त्र के अंतर्गत उन तत्वों का अध्ययन किया जाता है, जो वर्तमान में जैसी है उनकी उसी वर्तमान स्थिति में अध्ययन सामाजिक तत्वों के अंतर्गत सामाजिक नियमों का अध्ययन होता है, जो कि परिस्थितियों में संयोजित होती हैं।
  2. व्यवहारिक समाजशास्त्र:- व्यवहारिक समाजशास्त्र के अंतर्गत उस बात का अध्ययन होता है, कि जो आज स्थिति है, उसमें सुधार किस प्रकार से हो सकता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं, कि व्यवहारिक समाजशास्त्र में भविष्य का अध्ययन होता है, कि किस दिशा में कार्य किया जाना चाहिए,  यह व्यवहारिक समाजशास्त्र का क्षेत्र नहीं है। इसमें केवल कार्यविधि प्राप्त होती है सामाजिक समस्याओं का हल एवं उनके संदर्भ में सुझाव भी समाजशास्त्र के क्षेत्र का कार्य का कार्य है।

समाजशास्त्र का अर्थ Meaning of sociology 

अगर हम समाजशास्त्र की बात करें तो साधारण रूप से समाज का अध्ययन अर्थात समाज का विज्ञान ही समाजशास्त्र कहलाता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं, कि सोशियोलॉजी अंग्रेजी भाषा का शब्द है

जिसमें सोशियो (Socio) का अर्थ होता है समाज और लोजी (Logy) का अर्थ होता है "विज्ञान" इस प्रकार से कह सकते हैं, कि समाज का विज्ञान ही समाजशास्त्र कहलाता है। समाजशास्त्र का अर्थ विभिन्न विद्वानों ने निम्न प्रकार से दिया है

  1. दूर्खीम :- दुर्खीम महोदय ने कहा है कि समाजशास्त्र सामूहिक निरूपणो का विज्ञान होता है।
  2. मैकाइवर और पेज :- मैकाइवर और पेज के द्वारा समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र सामाजिक संबंध होता है।
  3. क्यूबर :- इन्होने कहा है, कि समाजशास्त्र मानव संबंधों के वैज्ञानिक ज्ञान की शाखा होती है।
  4. जॉर्ज सिमेल :- इनके द्वारा समाजशास्त्र मानव के अंतर संबंधों के स्वरूपों का विज्ञान माना जाता है।
  5. फेयर चाइल्ड:- फेयर चाइल्ड के अनुसार समाजशास्त्र मनुष्य एवं मानव पर्यावरण के संबंधों का अध्ययन होता है।
  6. मॉरिस गिनस्वर्ग :- इनके अनुसार समाजशास्त्र मनुष्यों की अन्य क्रियाओं और अंतर संबंधों उनकी दशाओं एवं परिवारों का अध्ययन होता है।

समाजशास्त्र की सीमाएँ Limitations of Sociology

  1. समाज शास्त्र नैतिक शास्त्र नहीं होता है।
  2. समाजशास्त्र सुधारशास्त्र के रूप में नहीं कहा जा सकता है।
  3. समाजशास्त्र मानव समाज का अध्ययन करता है।
  4. समाजशास्त्र एक विशेष समाज का अध्ययन करता है।
  5. समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र उन्हीं वस्तुओं तक सीमित होता है, जो कि मानव व्यवहार या उनके सामाजिक संबंधों को प्रभावित करती हैं।
  6. समाज सुधार मानव व्यवहार का नहीं वरन सामूहिक जीवन का अध्ययन कहलाता है।
  7. समाजशास्त्र के अंतर्गत समस्त सामाजिक विद्वानों का अध्ययन नहीं होता यदि उनका इससे बहुत अधिक गणित से संबंध है, परंतु जब इसके प्रभाव सामाजिक संबंधों पर पड़ते हैं तो उसी स्थिति में समाजशास्त्र उनका अध्ययन करता है। थोड़े से शब्दों में समाजशास्त्र की विषय वस्तु में मनुष्यों के सामाजिक संबंधों के उत्पादन तथा सामाजिक मूल्यों का समावेश होता है।

दोस्तों आपने यहाँ समाजशास्त्र की परिभाषा (Definition and Principles of Sociology) के साथ अन्य तथ्य पढ़े। आशा करता हूँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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  2. पाठ्यक्रम विकास के उपागम Approach to curriculum Building
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