पाठ्यक्रम विकास के उपागम Approach to Curriculum Development

पाठ्यक्रम विकास के उपागम Approach to Curriculum Development

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है, आज के हमारे इस लेख पाठ्यक्रम विकास के उपागम (Approach to Curriculum Development) में।

दोस्तों इस लेख के माध्यम से आज आप पाठ्यक्रम विकास के उपागमों के बारे में जानेंगे, जिससे एक पाठ्यक्रम अर्थात एक मजबूत पाठ्यक्रम का निर्माण होता है, जो छात्र केंद्रित होता है, तो आइए दोस्तों बढ़ते हैं  इस लेख में और जानते हैं, पाठ्यक्रम विकास के उपागम:-


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पाठ्यक्रम विकास के उपागम


पाठ्यक्रम विकास के उपागम Approach to Curriculum Development

किसी भी स्तर के पाठ्यक्रम का विकास विभिन्न प्रकार के उपागमों के ऊपर निर्भर होता है, क्योंकि उपागम वह एक दृष्टिकोण माना जाता है,

जिसके आधार पर उस विषय से संबंधित समस्याओं, तथ्यों आदि की विवेचना करके उस विषय से संबंधित किसी प्रकार के दृष्टिकोण प्रारूप का निर्माण होता है,

इसीलिए पाठ्यक्रम विकास में उपागम का बहुत ही महत्वपूर्ण भाग होता है। हम इस प्रकार से समझते हैं, कि जैसे पाठ्यक्रम विकास के लिए पाठ्यक्रम का उद्देश्य छात्रों का सभी प्रकार से विकास करना होता है

और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार के उपाय किए जाते हैं। विद्यालय में विभिन्न प्रकार की ऐसी क्रियाएँ की जाती है, जिससे छात्रों में छुपी हुई आंतरिक प्रतिभाओं को विकास किया जा सके।

इसके बाद शिक्षण अधिगम सामग्री का निर्माण उनका ठीक प्रकार से प्रयोग उनकी शिक्षकों के पास ठीक प्रकार से पहुंच आती है, क्योंकि इनके द्वारा शिक्षण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और मजबूत बनाया जाता है

और इसी प्रकार के उपाय पाठ्यक्रम के विकास के उपागम में प्रमुख रूप से सम्मिलित किए जाते हैं। साधारण शब्दों में कह सकते हैं,

कि पाठ्यक्रम के निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति करने के लिए विभिन्न प्रकार के जो उपाय बनाए जाते हैं, उन सभी को पाठ्यक्रम विकास के उपागम कहा जाता है।


उपागम के प्रकार Type of approach

पाठ्यक्रम विकास की दृष्टि से उपागम निम्न प्रकार के हो सकते हैं:-

  • विषय केंद्रित उपागम Subject centric approach

विषय केंद्रित उपागम वह उपागम होता है, जिसमें किसी उस विषय को अधिक महत्व दिया जाता है, जो विषय समाज तथा छात्रों के विकास के लिए उपयोगी होता है।

साधारण रूप से आप देखते हैं, कि कुछ पाठ्यक्रम ऐसे होते हैं, जिनका स्वरूप बड़ा होता है, विस्तृत होता है, किंतु कभी-कभी आपने यह भी देखा होगा, कि कुछ विषय ऐसे विषय होते हैं जो छोटे होते हैं,

उनका पाठ्यक्रम भी छोटा और संकुचित होता है। ऐसा इन विषयों इन पाठ्यक्रम की उपयोगिता के आधार पर होता है, क्योंकि जो विषय जो पाठ्यक्रम समाज के लिए अधिक उपयोगी होते हैं,

समाज में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, वे समाज के विकास और समाज और समाज के लोगों की उन्नति में अधिक सहयोगी होते हैं, उन विषयों और पाठयक्रम का स्वरूप भी विस्तृत होता है

उदाहरण के तौर पर हम विज्ञान और गणित को ले सकते हैं,क्योंकि इनकी वर्तमान में उपयोगिता और महत्व अधिक है। इसके विपरीत वे विषय जिनकी समाज के लिए आवश्यकता बहुत कम होती है,

वह संकुचित पाठ्यक्रम होते हैं और उनका अधिक महत्त्व भी नहीं होता है। उन पाठयक्रम और विषयों का स्वरूप संकुचित होता है। विषय केंद्रित पाठ्यक्रम के अंतर्गत विषय के उद्देश्य, विषय का स्वरूप,

उस विषय की उपयोगिता, विषय की सार्वभौमिकता  विषय से संबंधित संसाधन, विषय संबंधित शिक्षण विधियाँ आदि पर महत्वपूर्ण बिंदु आते है।

  • व्यापक क्षेत्र उपागम Wide area approach

व्यापक क्षेत्र उपागम से मतलब किसी पाठ्यक्रम के विस्तृत स्वरूप से होता है, क्योंकि एक तरफ तो वह पाठ्यक्रम विकास में सहायता करता है वही उसकी व्यापकता भी विकास में सहायता प्रदान करती है।

क्योंकि यह बात सत्य है, कि कोई भी प्रकार का पाठ्यक्रम क्यों ना हो उस को क्रियान्वित करने से पहले समाज की स्थिति, मानवीय समाज की विशेषता और उपलब्ध संसाधनों पर विचार अवश्य किया जाता है।

इसी क्रम में यह निश्चित हो जाता है, कि जो भी पाठ्यक्रम एक निश्चित क्षेत्र के लिए प्रभावी होता है। उसका पाठ्यक्रम भी निश्चित होता है,

जिस विकास का क्षेत्र व्यापक होता है उसका स्वरूप भी व्यापक होता है। जैसे कि पर्यावरण शिक्षा के पाठ्यक्रम का संबंध किसी निश्चित क्षेत्र से नहीं होता है,

उसका क्षेत्र व्यापक होता है। इसीलिए पर्यावरणीय शिक्षा का पाठ्यक्रम व्यापक रूप में दृष्टिगोचर नहीं होता है, इसके पाठ्यक्रम में वैश्विक स्तर के विद्वानों के विचारों को सम्मिलित किया जाता है,

तथा पर्यावरण संरक्षण संबंधित विभिन्न विधियों का भी समावेश इसमें देखने को मिलता है। इस प्रकार से उस विषय की व्यापकता और वैश्विक प्रभाव पाठ्यक्रम को व्यापक और विस्तृत बनाते हैं।

इसके अंतर्गत निम्न बिंदुओं पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जैसे कि उद्देश्यों की व्यापकता, शिक्षण विधियों में व्यापकता, शिक्षा की सार्वभूमिका, शिक्षा का महत्व, शिक्षा के कार्यों में वृद्धि, संचार की क्रांति, वैश्विक संस्कृति, शैक्षिक अनुसंधान का व्यापक क्षेत्र आदि।

  • सामाजिक समस्या केंद्रित उपागम Social problem focused approach

सामाजिक समस्या केंद्रित उपागम वह उपागम होता है, जो प्रमुख रूप से समाज की समस्याओं से संबंधित होता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं, कि समाज में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती रहती है,

जिन्हें सामाजिक समस्याएँ कहा जाता है और इन समस्याओं का समाधान शिक्षा के द्वारा ही होता है। इसीलिए इन समस्याओं के समाधान के लिए जो भी उपाय किए जाते हैं,

उनको पाठ्यक्रम का एक भाग बना दिया जाता है, जिससे उन समस्याओं के समाधान का उपाय सरल हो जाए और यह स्वाभाविक रूप से सम्पन भी हो जाए इस प्रकार से सामाजिक समस्या का समाधान

भी संभव हो जाता है और पाठयक्रम का विकास भी हो जाता है। उदाहरण के रूप में हम देखते हैं, कि समाज में दहेज प्रथा, जाति प्रथा की व्यवस्था को समाप्त करने के लिए पाठ्यक्रम में उनसे सम्बंधित

विभिन्न प्रकार की कहानियाँ और निबंध होते हैं। इन समस्याओं के साथ समाज में घटित कुछ सच्ची कहानियँ भी होती है, जब प्रत्येक छात्र बालक अवस्था से ही उनको पड़ेगा तो उनके प्रति अपना

रोष प्रकट करने लगता है, उन प्रथाओं के विपरीत हो जाता है और वह बड़ा होकर उनका पूरी रूप से विरोध करता है। धीरे-धीरे इस प्रकार की समस्याएँ और समाधान हो जाता है और वह समाज में भी

नहीं रहती हैं। सामाजिक समस्या उपागम का निर्माण करते समय निम्न प्रकार की बातों का ध्यान दिया जाता है जैसे कि अंधविश्वासों का उन्मूलन, सामाजिक कुरुतियों का उन्मूलन, सांस्कृतिक समस्याओं का समाधान,  सामाजिक गुणों के विकास की समस्या,

सामाजिक परिवर्तन संबंधित समस्याओं का समाधान, सामाजिक अन्याय के उन्मूलन के लिए, सामाजिक संकीर्णता के उन्मूलन के लिए, सामाजिक एकता संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए, आदि। 

छात्र केंद्रित उपागम Student centered approach

छात्रों के सर्वागीण विकास के लिए छात्र केंद्रित पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाता है, क्योंकि छात्र केंद्रित पाठ्यक्रम से छात्रों का विकास तीव्र गति से होता है और छात्र केंद्रित उपागम के माध्यम से

उस पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाता है जो छात्र केंद्रित होता है कियोकि यह छात्र के सभी प्रकार के विकास और शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बहुत ही सहयोगी हो जाता है।

विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों में सांस्कृतिक सामाजिक आध्यात्मिक और मानवीय मूल्यों का विकास का मार्ग प्रशस्त भी किया जाता है,

क्योंकि इस प्रकार से छात्रों के सर्वागीण विकास हेतु अनेक प्रकार के उपागम के माध्यम से पाठ्यक्रम विकास संभव होता है। उदाहरण के तौर पर प्राचीन काल में छात्रों की शिक्षण विधियाँ शिक्षक केंद्रित हुआ करती थी

जिसमें छात्रों की भूमिका बहुत ही कम होती थी, पर आज के समय में छात्र केंद्रित शिक्षा के फलस्वरुप शिक्षण विधियों की संख्या में तो वृद्धि हुई है

वहीं दूसरी और छात्र केंद्रित विधियाँ और उनका विकास भी किया गया है, जिस प्रकार से छात्र केंद्रित शिक्षा के कारण अनेक प्रकार की गतिविधियों का भी समावेश हो गया है, जिससे छात्रों का विकास संभव हो गया है।

छात्र केंद्रित उपागम के निर्माण के लिए,  पाठ्यक्रम के विकास में बाल केंद्रित शिक्षा का महत्व, छात्रों की क्रियाशीलता का महत्व, रुचि पूर्ण शिक्षण का उद्देश्य, प्रभावी शिक्षण अधिगम प्रक्रिया बालकों के

सर्वागीण विकास का उद्देश्य, कौशल विकास का उद्देश्य, सामाजिक विकास का उद्देश्य, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास का उद्देश्य आदि शामिल है।

दोस्तों आपने इस लेख में पाठ्यक्रम विकास के उपागम (Approach to Curriculum Development) पढ़े। आशा करता हूँ,आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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  1. पाठयक्रम के प्रकार Type of curriculum
  2. पाठयक्रम का अर्थ और परिभाषा Meaning and definition of curriculum
  3. स्वसर पठन क्या है गुण और दोष what is recitation

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