प्रयोजनवाद के जनक कौन है परिभाषा सिद्धांत who is the father of pragmatism

प्रयोजनवाद के जनक कौन है who is the father of pragmatism

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख प्रयोजनवाद के जनक कौन है (who is the father of pragmatism) में।

दोस्तों इस लेख के द्वारा आज आप प्रयोजनवाद के जनक कौन है? के साथ प्रयोजनवाद क्या है? प्रयोजनवाद की परिभाषा, प्रयोजनवाद के सिद्धांत आदि जानेंगे। तो आइये शुरू करते है, यह लेख प्रयोजनवाद के जनक कौन है:-


प्रयोजनवाद के जनक कौन है


प्रयोजनवाद क्या है what is pragmatism

प्रयोजनवाद एक नवीन दार्शनिक विचारधारा होती है जिसका आज के समय की समस्त विचारधाराओं में दर्शन और शिक्षा के क्षेत्र में सबसे प्रमुख स्थान है।

प्रयोजनवाद के जनक सुप्रसिद्ध दार्शनिक विलियम जेम्स हैं, इसके अलावा प्रयोजनवाद के कुछ विचार बेकम तथा लॉक नामक दार्शनिकों के विचारों में भी उपलब्ध होते हैं। प्रयोजनवाद विचारधारा के प्रसिद्ध दार्शनिक अमेरिका इंग्लैंड के महान विद्वान शिलर ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रयोजनवाद को अंग्रेजी भाषा में प्रागमेटिज्म (pragmatism) कहा जाता जाता है, जो एक ग्रीक भाषा का शब्द है यह प्रेग्मा Pregma से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ होता है "क्रिया" अर्थात व्यवहारिक ज्ञान व्यवहार दूसरे शब्दों में प्रयोजनवाद वह विचारधारा होती है,

जो उन्हीं बातों को सत्य मानती है जो कि व्यवहारिक जीवन में काम आती है। प्रयोजनवादी अमूर्त वस्तु शाश्वत सिद्धांतों, पूर्णता तथा उत्पत्ति में विश्वास नहीं करते इनके अनुसार सदैव देश काल तथा परिस्थिति के अनुसार सत्य परिवर्तित होता रहता है,

क्योंकि एक वस्तु अगर एक देश काल में तथा उनकी परिस्थितियों में उपयोगी होती है तो वह दूसरे जगह उन परिस्थितियों में उपयोगी नहीं हो सकती।

प्रयोगवाद को प्रयोजनवाद भी कहा जाता है, क्योंकि वह प्रयोग को ही सत्य की एकमात्र कसौटी मानता है, जिसे हम फलवाद के नाम से भी जानते हैं, क्योंकि इसमें किसी कार्य का मूल उसके परिणाम या फल के आधार पर आका नहीं जाता है। संक्षेप में कह सकते हैं,

कि प्रयोजनवाद या प्रयोगवाद या फलवाद वह विचारधारा है, जो उन्हीं क्रियाओं वस्तुओं सिद्धांतों तथा नियमों को सत्य मानती हैं, जो किसी देश काल और परिस्थिति में व्यवहारिक तथा उपयोगी होती हैं।


प्रयोजनवाद के जनक कौन है who is the father of pragmatism

प्रयोजनवाद एक नवीनतम् दार्शनिक विचारधारा है। वर्तमान युग में दर्शन एवं शिक्षा के विभिन्न विचारधाराओं में इस विचारधारा को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है।

इस विचारधारा को अर्थक्रियावाद, व्यवहारवाद, कारणवाद, अनुभववाद आदि के नाम से भी जाना जाता है। प्रयोजनवाद के जनक अमेरिका के पंडित विलियम जेम्स शिक्षाशास्त्री जॉन ड्युई तथा ग्रेट ब्रिटेन के डाक्टर एफ. सी. एस. शिलर हैं,

जबकि प्रयोजनवाद को आधुनिक रूप अमेरिका के सुप्रसिद्ध विचारक चार्ल्स सैन्डर्स पियर्स ने दिया है। यह विचारधारा आत्मा और परमात्मा को नहीं मानती और सत्य को परिवर्तनशील मानते है।


प्रयोजनवाद की परिभाषा Definition of pragmatism

प्रयोजनवाद को विभिन्न विचारकों ने निम्न प्रकार से परिभाषित किया है:-

  1. रॉस के अनुसार :- प्रयोजनवाद वस्तुतः एक मानवतावादी दर्शन होता है, जो यह मानता है, कि मनुष्य कार्य करने में अपने मूल्यों का सृजन करता है, कि सत्य अभी भी निर्माण की अवस्था में है और अपने स्वरूप का कुछ हिस्सा भविष्य के लिए छोड़ देता है, हमारे सत्य में मनुष्य निर्मित वस्तुएँ हैं।
  2. रस्क के अनुसार :- प्रयोजनवाद एक प्रकार की नवीन आदर्शवाद के विकास की अवस्था होती है, एक ऐसा आदर्शवाद जो वास्तविकता के प्रति पूर्ण न्याय करता है। व्यवहारिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का समन्वय भी करता है और इसके परिणामस्वरूप संस्कृति का निर्माण होता है, जिसमें निपुणता का प्रमुख स्थान होता है ना कि उसकी उपेक्षा होती है।
  3. जेम्स के अनुसार :- प्रयोजनवाद मन का एक स्वभाव एक अभिवृत्ति है, यह विचारों और सत्य की प्रकृति का एक सिद्धांतवाद और अंत में यह वास्तविकता के बारे में एक सिद्धांतवाद होता है।

प्रयोजनवाद के सिद्धांत Principles of pragmatism

प्रयोजनवाद एक प्रकार का मानववाद दृष्टिकोण से युक्त दर्शन होता है। प्रथम मनुष्य और उसके समाज में मनुष्य की क्रियाओं पर यह बल देने का कार्य करता है,

द्वितीय और यह उपयोगितावाद दर्शन भी कहलाता है, लेकिन इसका अस्तित्व एक स्वतंत्र दर्शन के रूप में लोगों ने माना है। प्रयोजनवाद के प्रमुख सिद्धांत निम्न प्रकार से हैं:-

  1. बहुतत्ववादी सिद्धांत :- प्रयोजनवाद का विश्वास होता है कि जगत का निर्माण बहुत से तत्वों के द्वारा होता है, इसीलिए विभिन्न प्रकार की क्रियाएं भी इसमें होती हैं और इसके फलस्वरूप यह संसार प्रकट होता है, इसमें निर्माण की क्रिया सदैव चलती रहती है, इसीलिए प्रयोजनवाद बहुतत्ववादी सिद्धांत को मानता है।
  2. भौतिकवाद सिद्धांत :- जगत का निर्माण भौतिक तत्वों से हुआ है और यह भौतिक तत्व अपने आप में पूर्ण वास्तविक और सत्य होते हैं। इनके अलावा और कोई तत्व नहीं होता है और वास्तविकता नहीं होती है, इस कारण आध्यात्मिकता की अवहेलना की जाती है।
  3. परिवर्तनशीलता का सिद्धांत :- प्रयोजनवाद सभी सत्य मूल्य आदर्श को परिवर्तनशील मानता है। देश काल तथा परिस्थिति के अनुसार मनुष्य मूल्य आदर्श सत्य को धारण भी करता है।
  4. क्रियाशीलता का सिद्धांत :- संसार में सभी वस्तुएँ स्थिर नहीं होती हैं, वे लगातार क्रियाशील रहती हैं। मनुष्य की आत्मा भी क्रियाशील स्थिति में बनी रहती है, ईश्वर या ब्रह्म जैसी कोई सार्वभौमिक सत्ता भी नहीं होती है। प्राकृतिक एवं सामाजिक पर्यावरण की उत्तेजना से मनुष्य की आत्मा क्रियाशील बनी रहती है और विचार क्रिया के परिणाम से ही होते हैं।
  5. उपयोगिता का सिद्धांत:- प्रयोजनवाद का विश्वास है कि संसार की प्रत्येक वस्तु उपयोगी होने के कारण ही सत्य होती है, स्वीकृत भी होती है। जीवन में सुख संतोष अच्छा फल देने वाला कार्य ही मनुष्य करता है, यही उसकी उपयोगिता का प्रणाम भी होता है।
  6. विकास का सिद्धांत :- प्रयोजनवाद के अनुसार मनुष्य अपने सामाजिक पर्यावरण में विकास करता है, उसके विकास का कारण उसकी आत्मा या प्रकृति नहीं होती वह तो सामाजिक क्रिया में भाग लेकर आगे बढ़ता है, इसलिए विकास का सिद्धांत भी प्रयोजनवाद का सिद्धांत होता है।
  7. प्रगतिशीलता का सिद्धांत :- प्रयोजनवाद के मानने वालों का कहना होता है, कि मनुष्य के द्वारा सत्यान्वेषण होता है,इस खोज के कारण वह प्रगति भी करता रहता है समाज की भाषा उसका ज्ञान कौशल उद्योग व्यवसाय सभी मानवीय प्रगति के ही परिणाम होते हैं जिनकी प्रगति निरंतर समाज में होती रहती है।
  8. सुखवादी का सिद्धांत:- प्रयोजनवादियों के अनुसार मानव जीवन का उद्देश्य सुखपूर्वक जीवन जीना होता है, इसके लिए परिस्थिति के साथ समायोजन करने की आवश्यकता भी पड़ती है और समस्या का समाधान भी करना होता है तभी जाकर सुख की प्राप्ति होती है।
  9. सामाजिक कुशलता का सिद्धांत :- प्रयोजनवादी लोगों का विश्वास होता है, कि प्रत्येक सदस्य को अपने समाज में रहकर समाज के उद्योग, उत्पादन, व्यवसाय आदि का विकास करना चाहिए इस प्रकार से कार्य करने से मानव में कुशलता आती है और वह समाज के लिए उपयोगी भी बन जाता है।
  10. मानवीय श्रेष्ठता का सिद्धान्त:- आदर्शवाद तथा प्रयोजनवाद दोनों मानव को सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानते हैं, कियोकि मनुष्य के पास विचार करने और क्रिया करने तथा निर्माण करने की क्षमता होती है और ऐसी अद्भुत क्षमता अन्य प्राणियों में देखने को नहीं मिलती है, इसलिए मनुष्य सभी प्राणियों में सबसे उत्तम श्रेष्ठ माना जाता है। मानव शक्ति पर प्रयोजनवाद इसीकारण बल देता है कियोकि मनुष्य एक निर्माता है।
  11. जनतंत्रीय सिद्धांत:- जहाँ प्रयोजनवाद मनुष्य को महत्व देता ,है वहाँ वह उसके द्वारा बनाए गए समाज और जनतंत्र में भी विश्वास करता है और इन पर बल भी देता है। इससे समानता स्वतंत्रता एवं भ्रातृत्व और सामाजिक न्याय के ऊपर प्रयोजनवाद बल देता है यह जनतंत्र सिद्धांत के कारण होते हैं।
  12. राज्य निर्माण का समाजवादी सिद्धांत:- प्रयोजनवादियों का विचार तथा विश्वास होता है, कि मनुष्य अपनी प्रगति उन्नति के लिए राज्य का निर्माण करता है। यह एक सामाजिक संस्था है और एक वास्तविक संस्था है, इसीलिए पूरे समाज का हित राज्य के ध्यान में रहता है इसी आधारभूत सिद्धांत पर अमेरिका में लोकतंत्र की रचना की हुई है।

दोस्तों यहाँ पर आपने प्रयोजनवाद के जनक कौन है (who is the father of pragmatism) के साथ अन्य तथ्य पढ़े, आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

इसे भी पढ़े:-

  1. प्रयोजनवादी शिक्षा की विशेषताएँ
  2. शिक्षा क्या है शिक्षा का अर्थ और परिभाषा



 


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