शिक्षा की प्रकृति Nature of education

शिक्षा की प्रकृति Nature of education

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख शिक्षा की प्रकृति (Nature of education) में।

दोस्तों इस लेख में आप शिक्षा प्रकृत्ति क्या है उसे जानेंगे। तो आइये दोस्तों हम शुरू करते है, यह लेख शिक्षा की प्रकृति:-


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शिक्षा की प्रकृति


शिक्षा की प्रकृति Nature of education

शिक्षा की विभिन्न परिभाषाऐं वैज्ञानिकों के द्वारा दी गई है, इसलिए शिक्षा की प्रकृति परिभाषाओं के आधार पर निम्नप्रकार से समझाई है:- 

अनवरत प्रक्रिया:- शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है, जो अनवरत रूप से चलती रहती है, अर्थात शिक्षा कभी ना बंद होने वाली प्रक्रिया है, जो मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक हमेशा ही चलती रहती है। जिसके द्वारा वह जीवन में नए नए अनुभव सीखता है विभिन्न प्रकार का ज्ञान भी प्राप्त करता है, अर्थात कह सकते हैं, कि मनुष्य जीवन में प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से कुछ ना शिक्षा के द्वारा सीखता रहता है, इसलिए शिक्षा को अनवरत प्रक्रिया कहते हैं।

सामाजिक प्रक्रिया:- शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया भी होती है, क्योंकि मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन व शिक्षा दोनों ही सामाजिक प्रक्रिया के रूप में ही होती है, यदि हम कहें कि बिना सामाजिक पर्यावरण के शिक्षा चल ही नहीं सकती तो यह बिल्कुल सत्य है। एक समय में ही हम भाषा सीख सकते हैं और विचार भी कर सकते हैं।

गतिशील प्रक्रिया :- परिवर्तन संसार का दूसरा नाम है, अर्थात संसार में परिवर्तन होता रहता है, इसलिए संसार के विभिन्न क्रियाकलापों में भी परिवर्तन होता है। जैसे कि समाज में परिवर्तन होता है, तो शिक्षा में भी परिवर्तन होता है। शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियाँ आदि में आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। यही शिक्षा की गतिशीलता भी कहलाती है। शिक्षा की गतिशीलता के कारण ही हम प्रगति करते हैं और प्रगति की ओर बढ़ते हैं, ज्ञान एवं कला कौशल सभी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी की ओर शिक्षा द्वारा बढ़ते रहते हैं।

शिक्षा द्विमुखी प्रक्रिया:- शिक्षा एक द्विमुखी प्रक्रिया के रूप में भी होती है अर्थात कह सकते हैं, कि शिक्षा की प्रक्रिया दो के मध्य चलती है, जिसमें एक प्रभावित होता है और दूसरे को प्रभावित किया जाता है। प्रो.जोन एडम ने शिक्षा को द्विमुखी माना है, उन्होंने द्विमुखी प्रक्रिया के अंतर्गत शिक्षक और शिक्षार्थी को स्थान दिया है, जिसमें शिक्षक प्रभावित करता है और शिक्षार्थी प्रभावित होता है।

शिक्षा त्रिमुखी प्रक्रिया:- बहुत से शिक्षाविदों ने वर्तमान में शिक्षा की स्थिति पाठ्यक्रम का स्वरूप देखकर शिक्षा को त्रिमुखी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने शिक्षा की त्रिमुखी प्रक्रिया के रूप में शिक्षक शिक्षार्थी के साथ ही सामाजिक पर्यावरण अर्थात पाठ्यक्रम को भी स्थान दिया है, क्योंकि सामाजिक पर्यावरण के कारण ही अलग-अलग समाज व देश का पाठ्यक्रम अलग-अलग होता है।

विकास की प्रिक्रिया :- मनुष्य का जन्मजात व्यवहार और प्रवृति पशुवत ही होती है,जो बिल्कुल सत्य हैं। सामाजिक पर्यावरण में उसके इस व्यवहार में परिवर्तन होना भी नियत ही है। परिवर्तन की यह प्रक्रिया ही शिक्षा कहलाती है। मानो कोई अपने अनुभवों को भाषा के माध्यम से सुरक्षित रखता है और उसको आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करता है। इससे ही समाज की संस्कृति सभ्यता का लगातार विकास होता है, इसलिए शिक्षा को विकास की प्रक्रिया के रूप में माना जाता है।

सर्वागीण विकास की प्रक्रिया :- वर्तमान में जो शिक्षा दी जाती है, उस शिक्षा का कार्य बालक की कुछ क्षमताओं और उसकी शक्तियों का विकास करना नहीं होता है, जबकि इसका कार्य बालक के व्यक्तित्व के सभी पहलुओं का विकास करना ही होता है, इसीलिए शिक्षा को सर्वागीण विकास की प्रक्रिया माना जाता है।

समायोजन की प्रक्रिया:- बालक के सर्वागीण विकास के लिए समायोजन भी बहुत ही जरूरी होता है, इसलिए शिक्षा समायोजन की प्रक्रिया भी मानी जाती है। व्यक्ति वही अच्छा होता है, जो अधिक से अधिक समायोजन करने का सक्षम होता है। समायोजन से अपना संतुलन भी विकसित होता है।

दोस्तों यहाँ पर आपने शिक्षा की प्रकृति (Nature of education) के बारे में पढ़ा। आशा करता हूँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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