बाल मनोविज्ञान नोट्स Child Psychology Notes

बाल मनोविज्ञान नोट्स Child Psychology Notes

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख बाल मनोविज्ञान नोट्स (Child Psychology Notes) में।

दोस्तों इस लेख में आप बाल मनोविज्ञान क्या है? बाल मनोविज्ञान का अर्थ, बाल मनोविज्ञान की परिभाषा, बाल मनोविज्ञान के जनक, बाल मनोविज्ञान के सिद्धांत, के साथ बाल मनोविज्ञान का महत्व जानेंगे। तो आइये पढ़ते है, यह लेख बाल मनोविज्ञान नोट्स:-


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बाल मनोविज्ञान नोट्स


बाल मनोविज्ञान क्या है What is Child Psychology

मनोविज्ञान की वह शाखा जिसके नियम तथा सिद्धांत बालक को प्रमुख मानकर उस पर निरूपण किया जाता है, वह विज्ञान बाल मनोविज्ञान (Child Psychology) कहलाता है।

बाल मनोविज्ञान के अंतर्गत प्रमुख रूप से बालक के व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है। साधारण भाषा में हम कह सकते हैं, कि वह विज्ञान जिसका बालक को केंद्र मानकर उसके विभिन्न पक्षों जैसे कि शारीरिक, संज्ञानात्मक, संवेगात्मक पक्ष के साथ

ही सामाजिक पक्ष के विकास को मजबूती प्रदान करने के लिए और उनका अध्ययन करने के लिए उसका उपयोग किया जाता है उसे बाल मनोविज्ञान कहा जाता है। बाल मनोविज्ञान के अंतर्गत बालक की प्रमुख विकासात्मक अवस्था जैसे गर्भावस्था,

शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था के व्यक्तित्व तथा व्यवहार को उचित दिशा प्रदान करके उनका उचित प्रकार से विकास की दिशा प्रदान करना होता है।


बाल मनोविज्ञान का अर्थ Meaning of Child Psychology

जब मनोविज्ञान शब्द में बाल उपसर्ग लगा दिया जाता है तब वह बाल मनोविज्ञान का रूप ले लेता है, जिसका अर्थ होता है "बालक के व्यवहार का विज्ञान" (The science of child behavior) अर्थात जब बालक के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है

तो वह बाल मनोविज्ञान के रूप में जाना जाता है। बाल मनोविज्ञान बच्चे के विकास तथा व्यवहार से संबंधित विज्ञान होता है, जिसके अंतर्गत बालक के शारीरिक संवेगात्मक संज्ञानात्मक तथा सामाजिक विकास का अध्ययन किया जाता है।


बाल मनोविज्ञान की परिभाषा Difination of Child Psychology

  1. क्रो एवं क्रो महोदय की परिभाषा - उन्होंने कहा, कि यह एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन हैं, जिसमें बालकों के गर्भावस्था से किशोरावस्था तक का अध्ययन किया जाता हैं।
  2. थॉमसन महोदय की परिभाषा - उनके अनुसार यह सभी को एक नई दिशा एवं उसे उचित रूप प्रदान करने का कार्य करता हैं, जिससे विकास की दिशा को उचित रूप दिया जा सकें।”
  3. डॉ परशुराम की परिभाषा - बाल मनोविज्ञान सामान्य बालक के व्यवहार,विचारों, क्रियाओं तथा भावनाओं का अध्ययन होता है। बालक के बाल्यावस्था को शिक्षा अवस्था के नाम से भी जाना जाता है और इसी अवस्था में वह भाषा कौशल अभ्यास व्यवहार आदि को सीखने लगता है। शिक्षणवाद में अलग-अलग होकर समन्वय होने लगता है और विश्व ज्ञान में परिणित हो जाता है। इस तरह बाल्यावस्था से शिक्षा से ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है अर्थात व्यक्ति का निर्माण बालक के विकास की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप होता है।

बाल मनोविज्ञान के जनक Father of Child Psychology

विश्व के कई विद्वानों ने लगभग 19 वीं शताब्दी में बालको के व्यवहार सम्बंधित अध्ययन की इक्षा जाहिर की और इसकी शुरुआत फ्रांस से हुई, बाल मनोविज्ञान का सबसे पहले अध्ययन फ्रांस में हुआ।

18 वीं शताब्दी में रूसो के द्वारा भी इस पर जोर दिया गया, किन्तु बाल मनोविज्ञान को सबसे अधिक महत्व 19 वीं शताब्दी में मिला, जिस पर हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert spencer) ने विशेष बल दिया।

बाल मनोविज्ञान के जनक जीन पियाजे (Jean Piaget) को माना जाता है, जिन्होंने अपना अधिक समय बालकों के व्यवहार के अध्ययन और उसको समझने में व्यतीत किया, उन्होंने बालकों के विकास से सम्बंधित कई सिद्धांत भी दिए,

किन्तु कहीं - कहीं विलियम जेम्स (William James) को भी बाल मनोविज्ञान के जनक के रूप में बताया गया है। विश्व के प्रथम बाल मनोवैज्ञानिक प्लेटो है, जिन्होंने मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान कहा तथा सबसे पहले बालक के व्यवहारों का अध्ययन किया

और प्लेटो (Plato) को वास्तविक बाल मनोविज्ञान के जनक (father of Child psychology) भी कहा जाता है, जबकि भारत के प्रथम बाल मनोवैज्ञानिक प्रो. गीजूभाई (Pro. gijubhai) है।


बाल मनोविज्ञान के सिद्धांत Principles of child psychology

मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत :- मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत के प्रतिपादक सिगमंड फ्रायड (Sigmund Freud) है, फ्रायड ने बाल्यावस्था के अनुभवों के आधार पर विकास को विभिन्न आयामों में वर्णन किया है, सिगमंड फ्रायड ने बालक के चार पांच वर्ष की अवस्था तक अध्ययन किया है और निम्न प्रकार के निष्कर्ष दिए हैं:-

सिगमंड फ्रायड के अनुसार :- बाल्यावस्था के नाटकीय अनुभव वाले क्षण वयस्क व्यक्ति के विकास का आधार होते हैं। 

सिगमंड फ्रायड की संकल्पना के अनुसार:- एक मनुष्य का शिशु असीमित संभावनाओं के साथ अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए अपनी क्षमताओं का धीरे-धीरे विकास करने लगता है।

व्यवहारवादी सिद्धांत :- व्यवहारवादी सिद्धांत के प्रतिपादक अमेरिका के व्यवहारवादी जॉन डॉलर (John Dollar) और पी. जे. नीर (P.J. neer) है। चाइल्ड सीयर्स और उनके साथियों ने कहा है,कि बालक के व्यवहार के आधार पर बालक की मनोदशा को आसानी से पहचाना जा सकता है, इसलिए बालक के मन में चल रहे मनोभाव से उनकी आवश्यकताओं का पता लगाना आसान हो जाता है।

महत्वपूर्ण आयु समूहों का सिद्धांत:- मानव विकास से संबंधित व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिकों ने जो मान्यताएँ दी हैं, उनके कुछ निश्चित काल विभाजित किए गए है। मनोविज्ञान में अवस्थाओं की अपेक्षा काल को अधिक महत्व दिया गया है और विशिष्ट अवस्था से गुजरना बालक का स्वाभाविक लक्षण है।

संज्ञानात्मक क्षेत्र सिद्धांत:- इस सिद्धांत के प्रतिपादक गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिक हैं, जिन्होंने कहा है, कि अगर बालक के सामने कोई समस्या आती है, तो उस समस्या को एक बड़े रूप में देखता है, किंतु है धीरे-धीरे उनको टुकड़ों में तोड़ कर हल करने में सक्षम होने लगता है।

विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर :- इस सिद्धांत के अनुसार माना जाता है, कि विकास की गति सामान्य से विशिष्ट की ओर होती है। बालक के सभी पक्षों जैसे कि शारीरिक मानसिक संवेगात्मक विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर सिद्धांत पर कार्य करता है।


बाल मनोविज्ञान का महत्व Importence of Child Psychology

बाल मनोविज्ञान का मुख्य लक्ष्य बालक पर केंद्रित होता है, अर्थात बाल मनोविज्ञान के द्वारा बालक के व्यवहारों का अध्ययन उसके मन का अध्ययन किया जाता है। इसीलिए बाल मनोविज्ञान का महत्व बालक के विकास के क्षेत्र में सबसे अधिक होता है।

अगर बालक के व्यवहारों का अध्ययन ठीक प्रकार से किया जाए तो उसको एक नई दिशा में विकास करके उसे एक सक्षम प्राणी के रूप में विकसित किया जा सकता है, बालक के व्यवहार के आधार पर उसका शिक्षण आसानी से मजबूत बनाया जा सकता है

और वह शैक्षिक लक्ष्य प्राप्त करने में सफल हो जाता है। बाल मनोविज्ञान के द्वारा ही छात्र-छात्राओं को समय- समय पर निर्देशित किया जाता है, इसके द्वारा छात्र - छात्राएँ अपने कौशलों का विकास करते हैं।

ज्ञान के द्वारा बालक के व्यवहार का भली-भांति अध्ययन हो जाता है जिससे बालक के लिए अनुकूलित पर्यावरण निर्मित कर दिया जाता है, जिसमें वह अपने आप का सामंजस्य कर लेता है।

बाल मनोविज्ञान का अध्ययन करके बालकों की विभिन्न प्रकार की समस्याओं के बारे में पता लगाया जाता है, तो वहीं दूसरी और बाल मनोविज्ञान के द्वारा बालक के व्यक्तित्व का अध्ययन हो जाता है, जिससे उसके भविष्य के बारे में भी अनुमान लगाया जा सकता है।

दोस्तों आपने यहाँ बाल मनोविज्ञान नोट्स (Child Psychology Notes) पढ़े। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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