मुर्गी पालन क्या है मुर्गी पालन के नियम what is poultry farming

मुर्गी पालन क्या है मुर्गी पालन के नियम what is poultry farming 

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत- बहुत स्वागत है इस लेख मुर्गी पालन क्या है मुर्गी पालन के नियम (what is poultry farming information) में।

दोस्तों इस लेख में आप मुर्गी पालन क्या है मुर्गी पालन की विधि के साथ अन्य सभी तथ्यों के बारे में जानेंगे। तो आइये करते है यह लेख शुरू मुर्गी पालन क्या है मुर्गी पालन की जानकारी:-

मुर्गी पालन क्या है मुर्गी पालन के नियम

मुर्गी पालन क्या है what is poultry farming 

मुर्गी पालन का आशय उस विधि और प्रक्रिया से है, जिसमें मुर्गियों को वैज्ञानिक पद्धति से अंडे मांस तथा विभिन्न प्रकार के अन्य लाभ हेतु बड़े-बड़े फार्मो में पाला जाता है, उसे ही मुर्गी पालन कहा जाता है।

जैसा की आप सभी देख रहे हैं, कि वर्तमान में मांस अंडे का व्यवसाय अधिक प्रचलित है और दिन पर दिन इसकी मांग भी बढ़ती जा रही है,

क्योंकि मांस और अंडे कई विटामिनों से भरपूर और पौष्टिक आहार की श्रेणी में आते हैं, इसीलिए मांस और अंडे की दिन पर दिन मांग होती जा रही है,

इसीलिए मांस और अंडों की पूर्ति करने के लिए मुर्गी पालन को विभिन्न राज्य सरकारों के द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें लोग वैज्ञानिक पद्धति से राज्य सरकार की सहायता से मुर्गी पालन करते हैं और बहुत ही अच्छा मुनाफा भी कमाते हैं।

मुर्गी पालन क्या है मुर्गी पालन के नियम

मुर्गी की नस्लें Chicken breeds

मुर्गों की कई प्रकार की नस्ल और किस्म पाई जाती हैं, इसीलिए इनको निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया गया है:-

अमेरिकन वर्ग American class

अमेरिकन वर्ग के अंतर्गत निम्न किस्म की मुर्गियाँ आती है:- 

  1. प्लाईमाउथ रॉक :- इस नस्ल की मुर्गी बड़े आकार की और अच्छे अंडे और मांस उत्पादन के लिए जानी जाती है। इस नस्ल की मुर्गे का वजन 4 किलो तक और मुर्गी का वजन 3 किलो 500 ग्राम तक हो सकता है। यह मुर्गी पट्टीदार और सफेद किस्म में अधिक होती है, जबकि इसकी अन्य किस्में वफ, नीली, कोलंबियन भी होती हैं।
  2. रोड़े आईलैंड :- इस मुर्गी का शरीर आयताकार और लंबा होता है, जबकि पीठ चपटी होती है, जो ज्यादातर भूरी और लाल रंग में होती है। यह दो किस्म में पाई जाती हैं एक कलगी और गुलाब कलगी इसका इसका बजन 3 किलो 500 ग्राम तक हो सकता है।
  3. न्यू हेंपशायर :- इसका शरीर भी आयताकार होता है, जो अधिकतर लाल रंग में पाई जाती है। यह एक कलगी वाली मुर्गी होती है, जिसका वजन भी 3 किलो 500 ग्राम तक हो सकता है।

अंग्रेजी वर्ग English Class 

अंग्रेजी वर्ग के अंतर्गत मुर्गियों की निम्न किस्में आती है:- 

  1. ससेक्स :- यह मुर्गी लंबे शरीर और चौड़ी छाती वाली होती है, जिसे लगभग 200 वर्ष पूर्व इंग्लैंड में खाने के उद्देश्य से विकसित किया गया था। यह एक कलगी वाली अच्छा मांस उत्पादित करने वाली मुर्गी होती है,  जिसका वजन 4 किलो तक हो सकता है।
  2. ओरपिंगटॉन :- इस नस्ल की मुर्गी भी इंग्लैंड में ही विकसित हुई थी, जो लंबे शरीर वाली होती है, इसका वजन 4 किलो 500 ग्राम तक हो सकता है, जो एक कलगी वाली होती है।

भूमध्यसागरीय वर्ग Mediterranean Class 

इस वर्ग के अंतर्गत निम्न मुर्गियों की किस्में आती है:- 

  1. लेगहॉर्न :- यह भूमध्यसागरीय क्षेत्र की सबसे प्रसिद्ध मुर्गी की नस्ल है, जो अंडे और मांस उत्पादन के लिए सबसे उत्तम और महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसे पालने में भोजन की खपत बहुत कम रहती है।
  2. मिनार्को :- मुर्गी की यह नस्ल लंबे शरीर वाली होती है, जबकि सिर पर एक बड़ी कलगी भी पाई जाती है। इसकी लगभग पांच प्रकार की किस्में देखने को मिलती हैं, इसका वजन 4 किलो तक हो सकता है।

एशियाई वर्ग Asian class

एशियाई वर्ग के अंतर्गत निम्न प्रकार की मुर्गियों की किस्में  आती हैं:- 

  1. ब्रह्मा :- इस मुर्गी की नस्लें ब्रह्मपुत्र नदी घाटी में विकसित हुई थी, इसलिए इसको ब्रह्मा के नाम से जाना जाता है। इसका अधिकतम वजन 5kg तक हो सकता है। 
  2. कोचीन :- इस मुर्गी की नस्लें चीन के शंघाई इलाके में विकसित हुई थी। यह मांस और अंडे के लिए विकसित की गई थी, जिसका वजन 5 केजी तक हो सकता है।
  3. असील :- यह भारत की एक देसी नस्ल की मुर्गी है, जो मांस के लिए बड़े ही स्तर पर उत्पादित की जाती है, यह 5kg तक की हो सकती है।

मुर्गी पालन प्रजनन की विधियाँ Poultry Breeding Methods

मुर्गी पालन हेतु जब उनका प्रजनन कराया जाता है, तो अच्छी उर्वरता को प्राप्त करने की इच्छा से कराया जाता है, इसीलिए उनका प्रजनन वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर किया जाना आवश्यक होता है, जिसे हम निम्न प्रकार से समझते हैं:-

  1. बाडा संगम :- इस प्रकार की विधि में छोटे-छोटे बाड़े बने होते हैं और उन बाड़ो में कई मुर्गियाँ और एक नर मुर्गी  होती है, किन्तु इस बाड़े में निषेचन की दर कम रहती है, क्योंकि कोई मुर्गी नर के साथ संगम नहीं करती है, जबकि कई मुर्गियाँ नर के साथ संगम करती हैं, जबकि नर मुर्गी भी अन्य के साथ संगम नहीं करती है।
  2. समूह संगम :- इस व्यवस्था में निषेचन की दर अधिक होती है, क्योंकि इसमें अनेक मुर्गों के साथ अनेक मुर्गियों को रखा जाता है, इसीलिए मुर्गी अपनी इच्छा के अनुसार जिस नर से निषेचित होना चाहती हो, उसके साथ संगम करती है।
  3. खूंटा संगम :- इस प्रकार की विधि में एक छोटे से बाड़े में नर मुर्गी के द्वारा मादा मुर्गीयों को एक-एक करके संगम हेतु छोड़ा जाता है, किन्तु इस विधि में परिश्रम तो अधिक करना पड़ता है।
  4. स्थानांतरित संगम :- इस प्रकार की प्रजनन विधि में जो प्रजनन होते हैं उनमें प्रयोग बारी-बारी से किया जाता है। इस प्रकार से इस विधि से मादाओ का परीक्षण तो हो ही जाता है, साथ ही जन्म काल में उन्हें अनेक से संगम करने का मौका भी मिल जाता है।   

अधिक अंडे देने वाली मुर्गियों का चयन Selection of chickens that lay more eggs

मुर्गियों के समूह में से जो मुर्गियाँ अधिक अंडे देती हैं और जो मुर्गियां कम अंडे देती हैं, तो उन कम अंडे देने वाली मुर्गियों को अधिक अंडे देने वाली मुर्गियों से अलग करना होता है,

इसके लिए मुर्गियों का निरीक्षण करना होता है। जो मुर्गी स्वास्थ्य होती है, वह अधिक अंडे देती है और प्रजनन के लिए उत्तम भी होती है।

इसके साथ ही उन मुर्गियों का सिर स्पष्ट रूप से नातोन्नत और फुर्तीला होता है, जो मुर्गी अधिक अंडे देती हैं, उनकी कलगी और कलगी चर्म चिकने और चमकदार लाल रंग के होते हैं,

जो छोटी-छोटी मजबूत व हल्के रंग की और रंगहीन भी हो सकती है, जबकि पक्षियों के गुदा द्वार के दोनों तरफ दो छोटी प्यूबिक अस्थियाँ पाई जाती हैं।

अंडे देने के समय दोनों ही अस्थियाँ एक दूसरे से इतनी दूर हो जाती हैं, कि उनके बीच दो या तीन अंगुल जगह हो जाती है। अधिक अंडा देने वाली मुर्गी के उधर कोमल और गहरे होते हैं आदि लक्षणों के आधार पर अधिक अंडे देने वाली मुर्गियों का चयन किया जाता है। 

अंडजयोत्पति Ovulation

जब अंडों से चूजे बाहर आते हैं, तो उस प्रक्रिया को अंडजयोत्पति के नाम से जाना जाता है और अंडे से चूजे के निकलने तक की अवधि को ऊष्मायन अवधि कहते हैं जो 21 दिन की होती है।

अंडजयोत्पति के लिए अंडों का चयन Selection of eggs for ovulation

अंडजयोत्पति के लिए अंडों के चयन के लिए अंडों का आमाप कैसा हो अंडों के आमाप चूजों की नस्लों पर निर्भर करता है, लेकिन प्रमुख रूप से मध्यम आकार के अंडों का चयन अति उत्तम होता है।

50 से 55 ग्राम के अंडे अंडजयोत्पति की दृष्टि से उत्तम होते हैं। समान्यतः अंडाकार आकृति वाले अंडों का ऊष्मायन के लिए रखना उत्तम माना जाता है।

इसके अलावा जिन अंडों के साफ और मोटे कवच होते हैं, उनका चयन करना अच्छा रहता है, जबकि जो अंडे गंदे होते हैं, तो उन्हें पहले धो लेना चाहिए।

अंडो का भंडारण Egg storage

अंडजयोत्पति की दर अच्छी प्राप्त करने के लिए जैसे ही मुर्गी अंडा देती है, उसे उठाकर इनक्यूबेटर नामक यंत्र में रख देना चाहिए। इसका सबसे प्रमुख कारण है, कि भंडारण की अवधि, भंडारण का ताप,

आद्रता एवं अन्य कारक अंडजयोत्पति प्रिक्रिया को प्रभावित करते हैं। ग्रीष्म ऋतु में भंडारण के तीसरे दिन और शीत ऋतु में अधिकतम सातवें दिन अंडो

के अंडजयोत्पति की प्रक्रिया प्रारंभ करनी चाहिए, जबकि अंडों का भंडारण करते समय अंडों की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए जैसे कि अंडों का सकरा वाला सीधा भाग ऊपर होना चाहिए।

ऊष्मायन की विधियाँ Methods of heating

ऊष्मायन की दो प्रकार की विधियाँ हैं:- 

प्राकृतिक विधि Natural method

प्राकृतिक विधि में मुर्गियों के द्वारा ही अंडो का ऊष्मायन कराया जाता है, इसके लिए मुर्गी को घोसले की आवश्यकता होती है।

अतः गोल टोकरी मिट्टी के बर्तन में कहीं रखकर उसमें लकड़ी की छीलन रखकर एक उत्तम स्थान घोंसला बना देते हैं, जो लगभग 8 सेंटीमीटर गहरा होना चाहिए।

अब उस घोसले में 10-15 अंडे रख देते हैं और मुर्गी को छोड़ देते हैं। प्रत्येक दिन मुर्गी को भोजन पानी आधे-आधे घंटे के समय अंतराल पर वहां देते रहते हैं,

जबकि गर्मी के दिनों में पर्याप्त आद्रता, नमी भी देना पड़ता है और अंडो पर जल छिड़काव भी करना पड़ता है। ऊष्मायन के साथ में अंडो का परीक्षण भी करना चाहिए और ऐसे अंडे हटा देना चाहिए,

जिनके अंदर भ्रूण की मृत्यु हो जाती है। अंडों का परीक्षण एक विधि के द्वारा आसानी से किया जा सकता है, जैसे कि एक कटोरे में 102 फॉरेनहाइट पर गर्म किए जल को भरकर उसमें 19 से 20 दिन

पुराने अंडों को रखकर देखना चाहिए जिन अंडों के अंदर जीवित चूजा होगा वह कुलबुलाने लगेगा और जिन के अंदर मरा हुआ चूजा होगा वह तैरने लगेगा।

इस परीक्षण में अंडे को एक मिनट से अधिक समय तक जल में नहीं रखना चाहिए। अब 21 वे दिन के बाद चूजे अंडो के छिलके तोड़कर बाहर आ जाते हैं।

तब घोसले को साफ करना चाहिए और चूजों को लगभग 36 घंटे तक आहार की आवश्यकता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

ऊष्मायन की कृत्रिम विधि Artificial method of heating

इस विधि के अंतर्गत ऊष्मायन की मशीन का उपयोग किया जाता है, जिसे इनक्यूबेटर बोलते हैं। यह कई प्रकार की आकार क्षमता के आधार पर अलग-अलग प्रकार की होती है, इसका प्रयोग करने से निम्न प्रकार की स्टेप फॉलो किए जाते हैं:-

  1. साफ सफाई :- ऊष्मायन इनक्यूबेटर का प्रयोग करते समय उसकी ठीक प्रकार से साफ-सफाई अति आवश्यक हो जाती है, इसीलिए ऊष्मायन की साफ-सफाई ठीक प्रकार से करनी चाहिए। 
  2. समतलन :- समतलमापी की सहायता से इनक्यूबेटर को समतलन करते हैं, जिससे उसमें उपयोग में लाई जाने वाली अवमंदक क्षण स्वतंत्रतापूर्वक लटकी रहे।
  3. परीक्षण :- अब इस मशीन का 103 डिग्री फारेनहाइट पर चलाकर परीक्षण कर लेते हैं, कि यह ठीक प्रकार से कार्य कर रही है, कि नहीं इसका परीक्षण 24 घंटे तक करते हैं।
  4. तापमान का नियमन :- अच्छे परिणाम प्राप्त करने हो तो उस इनक्यूबेटर का तापमान पहले दूसरे और तीसरे सप्ताह में क्रमशाह 101, 102 और 103 फारेनहाइट होना चाहिए।
  5. अंडो का घुमाना :-  ऊष्मायन के समय में अंडों को घुमाते रहना चाहिए, ताकि कवच की झिल्ली से चूजे चिपक ना जाए। अंडों को इस प्रकार से रखना चाहिए कि उनका चौड़ा वाला सिरा ऊपर की ओर रहे और ऊष्मायन के तीसरे दिन से अंडों को हिलाते घुमाते रहना चाहिए, यह क्रिया प्रत्येक दिन तीन से चार बार होनी चाहिए।
  6. अंडो का परीक्षण :- अंडो के अंदर चूजा मर चुका है या फिर जीवित है, इसका परीक्षण भी करते रहना चाहिए।
  7. अंडजयोत्पति के समय देखभाल :- ऊष्मायन के जब 19 दिन हो जाते हैं, तो इंक्यूबेटर में एक नर्सरी ट्रे लगा देनी चाहिए, क्योंकि जब चूजे अंडों के कवच तोड़कर बाहर आने लगते हैं, तो वे नर्सरी प्लेट में आ जाएँ, इस समय इनक्यूबेटर का तापमान अधिक रहता है। अगर चूजे अंडे तोड़कर 21 दिन से पहले आते हैं, तो मानो रिजल्ट अच्छा है। अबे चूजे अंडों से निकालकर प्रकाश की ओर बढ़ते हैं और वे नर्सरी ट्रे में गिर जाते हैं, जिसमें उनकी सहायता करनी चाहिए और चूजों को कम से कम 24 घंटे तक इंक्यूबेटर में ही रखना चाहिए तथा उन्हें ताजी हवा, पानी, भोजन आदि देने के लिए इंक्यूबेटर का दूसरा द्वार खोलना चाहिए। 

ब्रूडिंग एवं पालन पोषण Brooding and rearing

चीजों की 6 सप्ताह तक देखभाल करना उनका पोषण करना ब्रूडिंग कहलाता है। इसके पश्चात वह वयस्क में परिवर्तित होने लगते है और अंडा उत्पादन तथा मांस उत्पादन के लिए उपयोग में लाये जाते है।

ब्रूडिंग के समय चूजों को गर्म रखा जाता है, इसके लिए दो प्रकार की पद्धतियाँ उपयोग में लाई जाती हैं. एक तो गरम कमरे में ब्रूडिंग करते हैं और दूसरी ठंडे कमरे में ब्रूडिंग करते हैं।

गरम कमरे में ब्रूडिंग के लिए ब्रूडर ग्रह को केंद्रीय मापन पद्धति द्वारा गर्म रखा जाता है, इसके लिए गृह में बने पाइपों में गर्म जल होता है

और वायु प्रवाहित की जाती है। ठंडे कमरे में ब्रूडिंग के लिए ब्रूडर ग्रह की छतरी के नीचे वाले क्षेत्र का ही तापन किया जाता है. उष्णकटिबंधीय देशों में इस विधि का उपयोग अधिक होता है।

ब्रूडर का ताप प्रारंभ में 32 से 35 के बीच रखा जाता है फिर 25 सेंटीग्रेड तक कम करते हैं इसके बाद यह 21 सेंटीग्रेड तक पहुंच जाता है।

अब इन चूजों को कुक्कुट आवास में पहुँचा दिया जाता है, जहाँ पर उन्हें आवास के आकार पर उपस्थित मुर्गियों की नस्ल आयु संख्या के आधार पर निर्भर होना पड़ता है. लगभग 150 मुर्गियों को रखने के लिए

कम से कम 35 वर्ग सेंटीमीटर स्थान की आवश्यकता होती है। अंडे देने वाली मुर्गीयों को 15 से 25 के समूह में रखने पर अधिक संख्या में अंडा का उत्पादन होता है। व्यवसायिक दृष्टि से यदि 1 हजार से अधिक मुर्गियों को रखना हो तो उन्हें 100 से 125 मुर्गियों की छोटी छोटी इकाई में बांटना चाहिए।

दोस्तों आपने यहाँ मुर्गी पालन क्या है मुर्गी पालन के नियम (what is poultry farming) के साथ अन्य तथ्य पड़े आशा करता हूँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

इसे भी पढ़े:-

  1. पोषण किसे कहते है जानकारी
  2. विटामिन किसे कहते है प्रकार


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