मासिक चक्र क्या है what is the menstrual cycle

मासिक चक्र क्या है

मासिक चक्र क्या है what is the menstrual cycle

हेलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है आज के हमारे एक लेख मासिक चक्र क्या है (what is the menstrual cycle) में।

दोस्तों आज आप इस लेख के माध्यम से एक प्रमुख विज्ञान के टॉपिक मासिक चक्र के बारे में जानेंगे जिसे mc, ऋतुश्राव, तथा पीरियड के नाम से भी जाना जाता है, तो आइए दोस्तों जानते हैं, यह किस प्रकार से शुरू होता है:-

अनिषेकजनन क्या है इसका महत्व

मासिक चक्र किसे कहते हैं what is the menstrual cycle

पीरियड क्या होता है - पृथ्वी पर पाए जाने वाले लगभग सभी प्रकार के जंतुओं में मादा और नर दोनों ही होते हैं जिनकी जनन क्रियाएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं।

मादा में जनन क्रियाये चक्रीय रूप में होती हैं, अधिकांश मादाओं में मौसमी और समन्वित जन्म चक्र देखने को मिलता है, क्योंकि शिशुओं का जन्म उस समय और ऐसी परिस्थितियों में होता है,

जिस परिस्थिति में उन्हें वृद्धि तथा विकास हेतु सभी प्रकार की उपयुक्त दशाएँ उपलब्ध हो सकें। इसलिए स्तनियों में दो प्रमुख जनन प्रतिरूप देखने को मिलते हैं। मद चक्र और रजोधर्म चक्र

मद चक्र क्या है what is estrous cycle

मद चक्र अधिकांश स्तनियों में पाया जाने वाला जनन प्रतिरूप है, जो विशिष्ट प्रकार का होता है। इसमें मादा वर्ष की सीमित अवधि के दौरान ही नर के लिए ग्राही होती हैं। उस समय को ही

मादा का मदकाल काल कहा जाता है। जब मद चक्र समाप्त हो जाता है, उसके पश्चात गर्भाशय की दीवार बिना टूट-फूट के अपनी वास्तविक स्थिति में आ जाती है तथा किसी भी प्रकार का रक्त स्राव भी नहीं होता।

रजोधर्म चक्र क्या है what is menstrual cycle

रजोधर्म चक्र अधिकतर प्राईमेट्स (Primates) वर्ग के जंतुओं में पाया जाने वाला जनन प्रतिरूप होता है, जिस में जनन प्रक्रिया पड़ी विशिष्ट तथा कठिन होती है।

इस जनन प्रक्रिया में मादाओं के अंडाशय, गर्भाशय में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन होते हैं। इस चक्र के अंत में गर्भाशय की दीवार जिसे एंडोमेट्रियम (Endometrium) कहा जाता है,

जो विध्वंस होती है, जिसके पश्चात रक्तस्राव (Bleeding) होने लगती है। मादाओं में मासिक चक्र 13 वर्ष की आयु में प्रारंभ होता है, इसे रजोदर्शन या यौवनारंभ के नाम से जाना जाता है।

रजोधर्म चक्र 13 वर्ष से लेकर लगभग 45 से 50 वर्ष की आयु तक चलता रहता है, इसके पश्चात बंद हो जाता है उस अवस्था को रजोनिवृत्ति (Menopause) कहा जाता है। मासिक धर्म का नियंत्रण पीयूष ग्रंथि

(Pituitary gland) तथा अंडाशय (Ovary) से निकलने वाले हारमोंस (Hormonse) के द्वारा होती है। मासिक धर्म की औसत अवधि 28 दिन की होती है जैसे निम्न अवस्थाओं में बाँटा गया है:- 

रजोश्राव प्रावस्था (Mensuration phase) 

यह रजोधर्म चक्र की प्रथम प्रावस्था होती है, जिसकी अवधि 5 से 6 दिन के बीच रहती है। जब निषेचन नहीं हो पाता है, तब कॉर्पस ल्यूटियम (Corpus luteum) विलुप्त हो जाता है,

उस स्थिति में रक्त में पुटिकीय हार्मोन एस्ट्रोजन (Estrogen) और ल्यूटियल हार्मोन प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) की मात्रा काफी कम हो जाती है,

इसके फलस्वरूप गर्भाशय की दीवारों की रक्तवाहिनी सिकुड़ने लगती हैं और रक्त की आपूर्ति बाधित होने लगती है। इसके पश्चात गर्भाशय की एंडोमेट्रियम विघटित होकर उतरने लगती है,

इस प्रकार से रजश्राव में निकलने वाले रक्तस्राव में एंडोमेट्रियम के टुकड़ों के साथ ही कुछ ऊतक (Tissue) के टुकड़े, द्रव्य श्लेष तथा रक्त बहुत अधिक मात्रा में होता है।

पूर्वअंडोत्सर्गीय प्रावस्था (Preovuluatory Phase)

पूर्वअंडोत्सर्गीय प्रावस्था रजोधर्म की प्रावस्था के बाद अर्थात सातवें दिन से शुरू हो जाती है और 13 वें दिन तक चलती है, इसको प्रचुरोदभवन प्रावस्था के नाम से भी  जाना जाता हैं।

इस प्रावस्था में पीयूष ग्रंथि से फॉलिकल स्टिमुळेटिंग होर्मोन्स (follicle-stimulating hormonse) निकलता है, जो अंडाशय में उपस्थित पुटिकाओं में से किसी एक पुटिका को वृद्धि के लिए उत्तेजित करता है और उसमें वृद्धि आरंभ हो जाती है।

इसके बाद यह पुटिका एस्ट्रोजन तथा इन्हीबिन हार्मोन का स्त्राव करने लगती है, जिससे  फॉलिकल स्टिमुळेटिंग हारमोंस का श्रावण कम हो जाता है, ताकि अन्य पुटिकाओं में वृद्धि प्रारंभ ना हो सके।

अब जो पुटिका वृद्धि कर रही है, वह पुटिका वृद्धि करने के पश्चात परिपक्व हो जाती है, तथा अंडाशय की सतह पर उभरने लगती है अब इसको ग्रेफियन पुटिका (Graphian vesicle) कहा जाता है,

जब अंडाणु (Ovam)  परिपक्व हो जाता है, तब यह पुटिका फूल कर फट जाती है और अंडाणु मुक्त हो जाता है, जिसे अंडोत्सर्ग (Ovulation) कहा जाता है, जो चौदहवे दिन होता है।

इस समय मादा के शरीर का ताप बढ़ता है तथा सम्भोग की इच्छा जाग्रत होने लगती है। अंडोत्सर्ग के समय एस्ट्रोजन होर्मोन्स अधिक श्रावित होता है,

जिससे गर्भाशय की दीवारों का फिरसे निर्माण होता है और अंडाशय की सतह पर मुक्त हुआ अंडाणु जिसे द्वितीयक अंडक कोशिका कहते है फैलोपियन नाल (Fallopian tube) में पहुँच जाता है। 

पश्चअंडोत्सार्गीय प्रावस्था (Postovulatory Phase)

यह तीसरी प्रावस्था होती है, जो 14 से 28 वें दिन तक चलती है, इस प्रवस्था को श्रावी प्रावस्था, और पूर्वरजोधर्म प्रावस्था भी कहते है।

इस अवस्था में एस्ट्रोजन होर्मोन्स पीयूष ग्रंथि को प्रेरित करता है, जिससे पीयूष ग्रंथि ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (luteinizing hormone) स्रावित करती है।

यह ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन क्षतिग्रस्त पुटिका की कोशिकाओं को पुनरुदभवन के लिए प्रेरित करती है, जिससे कार्पस लुटियम का निर्माण होता है।

कार्पस लुटियम प्रोजेस्ट्रोन के साथ कुछ मात्रा में एस्ट्रेडीओल को भी स्रावित करता है। इन हारमोंस के कारण गर्भाशयी एंडोमेट्रियम मोटी हो जाती है और इसमें रक्त की आपूर्ति पूरी हो जाती है।

फैलोपियन नाल में अंडाणु कुछ ही समय जीवित रहता है, अगर अंडाणु का निषेचन होता है, तो अंडोत्सर्ग के सातवें दिन अंडाणु गर्भाशय (Uterus) में पहुँच जाता है और कार्पस लुटियम भी सक्रिय हो जाता है।

इसके द्वारा स्रावित हार्मोन गर्भाशय को गर्भधारण के लिए अनुकूल बनाते हैं, गर्भधारण के पश्चात भ्रूणीय विकास के परिणामस्वरूप बने अपरा (Placenta) द्वारा कोरियॉनिक गोनेडोटरोपिन हार्मोन श्रावित होता है।

गर्भधारण के कुछ ही हफ्तों के अंदर अपरा स्वयं एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन श्रावित करने लगता है। कॉर्पस ल्यूटियम की भूमिका समाप्त हो जाती है और यह विकसित होकर विलुप्त हो जाता है,

किंतु अगर निषेचन (Fertilization) नहीं होता है, तो कार्पस लुटियम शीघ्र ही विलुप्त हो जाता है और एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्ट्रोन के अभाव के कारण रक्त स्राव होने लगता है तथा अगला राजोधर्म चक्र प्रारंभ हो जाता है। 

दोस्तों आपने इस लेख में रजोधर्म चक्र पीरियड क्या होता है (what is the menstrual cycle) के बारे में विस्तार से पड़ा आशा करता हूँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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  2. वृषण और अंडाशय के कार्य
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