सूक्ष्म शिक्षण के जनक father of micro teaching

सूक्ष्म शिक्षण के जनक

सूक्ष्म शिक्षण के जनक father of micro teaching

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है, आज के हमारे इस लेख सूक्ष्म शिक्षण विधि के जनक (father of micro teaching) में।

दोस्तों आज हम इस लेख के माध्यम से शिक्षण का एक महत्वपूर्ण टॉपिक सूक्ष्म शिक्षण लेकर आए हैं, जिसके अंतर्गत आप जानेंगे कि सूक्ष्म शिक्षण क्या है? सूक्ष्म शिक्षण के जनक कौन हैं?

सूक्ष्म शिक्षण के सोपान क्या हैं और सूक्ष्म शिक्षण का चक्र किस प्रकार से चलता है? तो आइए दोस्तों करते हैं, आज का यह लेख शुरू सूक्ष्म शिक्षण के जनक कौन हैं:-

सूक्ष्म शिक्षण क्या है अर्थ परिभाषा

सूक्ष्म शिक्षण के जनक कौन है father of micro learning

सूक्ष्म शिक्षण एक ऐसी अध्यापक प्रशिक्षण (Teacher training) प्रक्रिया है जिसमें अध्यापक बनने से पहले आपको प्रशिक्षण लेना होता है,

कि बच्चों को किस प्रकार से तर्कपूर्ण और प्रभावपूर्ण शैली से पढ़ाया जा सके। साधारण शब्दों में कह सकते हैं, कि सूक्ष्म शिक्षण कक्षा का एक छोटा सा आकार होता है।

सूक्ष्म शिक्षण विधि के जनक / माइक्रो टीचिंग के जनक डी• एलन (D.Allen) है, इन्होंने ही सूक्ष्म शिक्षण का नामकरण 1963 में अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) में किया था।

सूक्ष्म शिक्षण के जनक

सूक्ष्म शिक्षण चक्र Micro learning cycle

सूक्ष्म शिक्षण शिक्षण में वह एक चक्र होता है जिसमें छात्राध्यापिका या छात्राध्यापक एक चक्र में अपने पाठय विषय का प्रस्तुतीकरण अपने सहपाथियों तथा निरीक्षक के सामने देता है।

जिसमें सबसे पहले छात्राध्यापक या छात्राध्यापिका अपने पाठय विषय की योजना बनाते है फिर सहपाठियों तथा कक्षा अध्यापकों के सामने उस पाठक विषय का प्रस्तुतीकरण देते हैं।

प्रस्तुतीकरण देने के पश्चात सहपाठी और कक्षा अध्यापक दिए गए पाठक विषय के प्रस्तुतीकरण पर छात्राध्यापक या छात्राध्यापिका को यह बताते हैं,

कि उनका प्रस्तुतीकरण कैसा रहा अगर प्रस्तुतीकरण सकारात्मक रहा तो सूक्ष्म शिक्षण यहीं समाप्त हो जाता है किन्तु अगर प्रस्तुतीकरण में कुछ गलतियाँ है तो निरीक्षक बताते है

कि उसने कहाँ -कहाँ प्रस्तुतीकरण में गलतियाँ की हैं? और प्रस्तुतीकरण में उन्हें क्या क्या सुधार करना है? इसके पश्चात छात्राध्यापक और छात्राध्यापिका फिर से अपने पाठक विषय की योजना बनाते हैं

उसे फिर से तैयार करते हैं और पुनः अपने सहपाठियों और कक्षा अध्यापकों के सामने प्रस्तुत करते हैं, इसके बाद फिर से सहपाठी और कक्षा अध्यापक उस प्रस्तुतीकरण पर अपना निष्कर्ष देते हैं

और छात्राध्यापक तथा छात्राध्यापिका फिर से अपनी पाठ योजना बनाते हैं। इस प्रकार से यह एक चक्र पूर्ण हो जाता है जिसे सूक्ष्म शिक्षण चक्र (Micro teaching cycle) कहा जाता है।

सूक्ष्म शिक्षण चक्र लगभग 36 मिनट का होता है। जिसका पहला चरण योजना बनाना होता है, पहले चरण में छात्राध्यापक या छात्राध्यापिका अपने पाठक विषय की योजना बनाते हैं,

उसे तैयार करते हैं, इसका कोई निश्चित समय नहीं होता यह कार्य घर पर भी किया जा सकता है। इसके बाद दूसरे चरण आता है, जिसमें शिक्षण का कार्य होता है।

दूसरे चरण में छात्राध्यापक या छात्राध्यापिका अपने द्वारा तैयार किए गए पाठक विषय का अपने सहपाठियों तथा कक्षा अध्यापक के सामने प्रस्तुतीकरण देते हैं,

अर्थात सूक्ष्म शिक्षण का दूसरा चरण शिक्षण का चरण होता है। इसके लिए 6 मिनट निर्धारित किए गए हैं, इसके पश्चात सूक्ष्म शिक्षण का तीसरा चरण आता है, जिसे पृष्ठ पोषण कहा जाता है।

इस चरण में छात्राध्यापक या फिर छात्राध्यापिका द्वारा अपने पाठक विषय का जो प्रस्तुतीकरण दिया है उस पर सहपाठी तथा कक्षा निरीक्षक अपने-अपने विचार देते हैं

तथा प्रस्तुतीकरण में की जाने वाली गलतियाँ बताते है तथा सुधार के बारे में बताते हैं, यह चरण भी 6 मिनट का होता है।

अगर पृष्ठ पोषण सकारात्मक है तो सूक्ष्म शिक्षण यहीं समाप्त हो जाता है किन्तु नकारात्मक पृष्ठ पोषण होने पर सूक्ष्म शिक्षण का चौथा चरण आता है, जिसे ही पुनः योजना कहा जाता है।

सूक्ष्म शिक्षण के इस चौथे चरण में छात्राध्यापक या छात्राध्यापिका को वही कक्षा में अपने पाठय विषय को अपने सहपाथियों तथा कक्षा अध्यापक के द्वारा दिए गए सुझावों के आधार पर फिरसे तैयार करना पड़ता है,

जिसके लिए 12 मिनट का समय निर्धारित किया गया है। पुनः योजना के बाद सूक्ष्म शिक्षण का पाँचवा चरण आता है, जिसे पुनः शिक्षण कहते है,

इसमें फिरसे छात्राध्यापक या छात्राध्यापिका पुनः योजना में तैयार पाठय विषय को अपने सहपाठियों तथा कक्षा अध्यापक के सामने प्रस्तुत करता है, इसके लिए भी 6 मिनट का समय निर्धारित किया गया है।

इसके बाद सूक्ष्म शिक्षण का आखिरी और छठवाँ चरण आता है, जिसे पुनः पृष्ठ पोषण कहते है, इसमें फिर से सहपाठी तथा कक्षा अध्यापक प्रस्तुतीकरण में दिए गए पाठ्य विषय में कुछ कमियाँ

तथा उन्हें सुधारने के लिए सुझाव देते हैं, इसके लिए भी 6 मिनट का समय निर्धारित किया गया है। यहाँ पर सूक्ष्म शिक्षण का एक चक्र पूरा हो जाता है।

इसके बाद छात्राध्यापक या छात्राध्यापिका को फिर से योजना तैयार करने के लिए कहा जाता है जो घर पर या और कहीं आराम से कर सकते हैं और दूसरे चक्र के लिए तैयार हो जाते है।

सूक्ष्म शिक्षण चक्र का समय Time of Micro teaching

  1. पाठ योजना - इसे शिक्षक पूर्व में ही तैयार करके आते है।
  2. शिक्षण (6 मिनट)
  3. पृष्ठ पोषण (6 मिनट)
  4. पुनः पाठ योजना (12 मिनट)
  5. पुनः शिक्षण (6 मिनट)
  6. पुनः पृष्ठ पोषण (6 मिनट)

इस प्रकार से सूक्ष्म शिक्षण के एक चक्र में कुल 36 मिनट का समय लगता है। 

सूक्ष्म शिक्षण के सोपान Micro teaching ke sopaan 

सूक्ष्म शिक्षण के चक्र में जो छह चरण एक चक्र का निर्माण करते हैं उन सभी चरणों को ही सूक्ष्म शिक्षण के सोपान कहा जाता है। सूक्ष्म शिक्षण के सोपान निम्न प्रकार से समझाये गए हैं:- 

  1. योजना बनाना (Make a plan) - यह सूक्ष्म शिक्षण का प्रथम सोपान माना जाता है, इसके अंतर्गत छात्राध्यापक या छात्राध्यापिका अपने पाठक विषय को तैयार करते हैं, इसके लिए वह अपने पाठ्य विषय वस्तु की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं तथा घर बैठकर योजना तैयार कर सकते हैं।
  2. शिक्षण (Teaching) - सूक्ष्म शिक्षण का दूसरा सोपान शिक्षण का होता है, जिसके अंतर्गत छात्राध्यापक या छात्राध्यापिका के द्वारा जो भी पाठक विषय तैयार किया गया है, उसका शिक्षण/प्रस्तुतीकरण छात्राध्यापक और छात्राध्यापिका अपने सहपाठियों, अध्यापक और निरीक्षक के सामने देता है।
  3. पृष्ठ पोषण (Feedback) - पृष्ठ पोषण सूक्ष्म शिक्षण का तीसरा सोपान है, जिसमें छात्राध्यापिका या छात्राध्यापक के द्वारा दिए गए अपने पाठक विषय के प्रस्तुतीकरण में क्या-क्या कमियांँ है? और क्या-क्या उसमें सुधार करने हैं? यह उनके सहपाठी, अध्यापक और निरीक्षक बताते हैं। यदि पृष्ठ पोषण सकारात्मक है तो सूक्ष्म शिक्षण यहीं समाप्त हो जाता है, किन्तु नकारात्मक होने पर चौथा सोपान पुनः योजना आता है। 
  4. पुनः योजना (R-eplan) - सूक्ष्म शिक्षण का चौथा सोपान पुनः योजना होता है, जिसके अंतर्गत छात्राध्यापिका या छात्राध्यापक पाठक विषय की योजना तथा तैयारी अपने सहपाठियों, अध्यापक तथा निरीक्षक के द्वारा बताए गए सुझावों के आधार पर उसी समय करते हैं।
  5. पुनः शिक्षण (Re-Teaching) - पुनः शिक्षण सूक्ष्म शिक्षण का पाँचवा सोपान है, जिसके अंतर्गत छात्राध्यापिका या छात्राध्यापक पुनः योजना में तैयार किए गए अपने पाठय विषय को फिर से सहपाठियों, अध्यापक तथा निरीक्षक के सामने प्रस्तुत करता है।
  6. पुनः पृष्ठ पोषण (Re-Feedback)- पुनः पृष्ठ पोषण सूक्ष्म शिक्षण का अंतिम सोपान अर्थात छठवाँ सोपान है। जिसके अंतर्गत छात्राध्यापिका तथा छात्राध्यापक के द्वारा दिए गए पुनः शिक्षण अर्थात पुनः प्रस्तुतीकरण में क्या गलतियाँ हुई है? और क्या सुधार करने हैं? इसका निर्धारण फिर से उनके सहपाठी, अध्यापक और कक्षा निरीक्षक करते हैं।

दोस्तों आपने इस लेख में सूक्ष्म शिक्षण के जनक (father of micro teaching) सूक्ष्म शिक्षण के सोपान तथा चक्र पढ़े। आशा करता हूँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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  2. निगमन विधि किसे कहते है, जनक, सूत्र, सोपान, गुण और दोष
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