हरित गृह प्रभाव क्या है कारण निवारण What is Greenhouse Effect cause prevention

हरित गृह प्रभाव क्या है

हरित गृह प्रभाव क्या है कारण निवारण What is Greenhouse Effect cause prevention

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है इस लेख हरित गृह प्रभाव क्या है कारण निवारण में। दोस्तों यहाँ पर आप हरित गृह प्रभाव के बारे में विस्तृत जानकारी जान सकेंगे,

कि हरित गृह प्रभाव क्या है इसके कारण कौनसे से है क्या हानियाँ है और इस समस्या से कैसे निजात पा सकते है। तो आइये दोस्तों करते है, यह लेख शुरू हरित गृह प्रभाव क्या है कारण निवारण:-

फसलों का वर्गीकरण

हरित गृह प्रभाव क्या है What is Greenhouse Effect

पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार की गैंसे है, और वायु विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण (Mixture of gase) है। आज के समय में वायुमंडल में लगभग 78% नाइट्रोजन गैस 21% ऑक्सीजन गैस

0.93% आर्गन गैस 0.032% कार्बन डाइऑक्साइड गैस के साथ अन्य अक्रिय गैसे पाई जाती हैं। इन गैसों में कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का स्वभाव होता है,

कि वे सौर विकिरण में उपस्थित लघु तरंग धैर्य वाली विकिरण के लिए तो पारगमय है, किन्तु दीर्ध तरंगधैर्य विकिरण जो तापमान युक्त होती है

को परावर्तित कर देती हैं। इसलिए सूर्य से आने वाली दृश्य और पराबैगनी किरणे (Ultraviolet rays) बिना किसी अवरोध के कार्बन डाइऑक्साइड में से गुजरकर पृथ्वी पर पहुंचती हैं।

पृथ्वी से टकराने के बाद दीर्ध अवरक्त विकिरण कार्बन डाइऑक्साइड गैस तथा अन्य गैसों के कारण पृथ्वी पर ही रुक जाती है।

जिसके परिणाम स्वरुप वायुमंडल के निचले भाग में अधिक ऊष्मा एकत्रित होने लगती है, और वह भाग गर्म होने लगता है। इस समस्त घटना को ही ग्रीन हाउस प्रभाव (Green house effect) के नाम से जाना जाता है।

पृथ्वी के वायुमंडल के तापमान के लिए ग्रीन हाउस गैसेस उत्तरदाई होती हैं। अगर पृथ्वी के वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैस नहीं होती तो पृथ्वी का तापमान 15 डिग्री सेंटीग्रेड से

-18 डिग्री सेंटीग्रेड तक हो सकता था। साधारण शब्दों में कह सकते कि विभिन्न गैसों के कारण पृथ्वी के वायुमंडल का गर्म होना ग्रीन हाउस प्रभाव कहलाता है। 

ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण Causes of Greenhouse effect 

ग्रीन हाउस प्रभाव का सबसे प्रमुख कारण ग्रीनहाउस गैसेस जिनमें कार्बन डाइऑक्साइड(CO2) मीथेन (CH4) नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) के साथ ही क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) आदि आती हैं, जिनका वर्णन निम्न प्रकार से हैं:-

कार्बन डाइऑक्साइड Carbon dioxide

कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रीन हाउस प्रभाव का सबसे प्रमुख कारण माना जाता है। औद्योगिक गतिविधियों, बढ़ती जनसंख्या और वृक्षों का कटना आदि क्रियाये कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि करती है,

जिसके परिणामस्वरूप ग्रीन हाउस प्रभाव की घटना उत्पन्न हो रही है। भारत तथा विदेशों में औद्योगिक क्रांति के पहले 280 कार्बन डाइऑक्साइड अणु प्रति मिलियन हवा के अणुओ में (280ppm) थे।

किन्तु 1980 के दशक में यह सांद्रता 340 पीपीएम तथा 2000 के दशक में 368 पीपीएम से भी अधिक पहुँच गई है। तथा यह भी कल्पना की जा रही है,

कि 2050 के दशक तक कार्बन डाइऑक्साइड गैस की सांद्रता 560 पीपीएम से भी अधिक पहुँच जाएगी। जो पृथ्वी पर संपूर्ण जीवन के

अस्तित्व के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करने में कार्बन डाइऑक्साइड गैस का प्रतिशत लगभग 60 है।

मीथेन Methane

वायुमण्डलीय तापमान और जलवायु को प्रभावित करने वाली दूसरी प्रमुख गैस मीथेन को माना जाता है। विभिन्न प्रकार के प्रदूषण के कारण आज मीथेन की भी सांद्रता पहले से भी कहीं अधिक हो गई है,

जो वायुमंडलीय वातावरण तथा तापमान में उत्तरदाई कारक के रूप में भूमिका निभाती है। यह गैस ग्रीन हाउस प्रभाव में लगभग 20% से भी अधिक भूमिका निभाती है।

नाइट्रस ऑक्साइड Nitrous oxide

नाइट्रस ऑक्साइड एक ऐसी ग्रीन हाउस गैस हैं, जो ग्रीन हाउस प्रभाव में 6% तक योगदान देती है। जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध प्रयोग, रासायनिक उर्वरकों का लगातार अधिक मात्रा में उपयोग

विभिन्न प्रकार के जंतुओं के अपशिष्ट आदि के कारण नाइट्रस ऑक्साइड की सांद्रता में वृद्धि भी होती जा रही है। जिसका प्रभाव ग्रीन हाउस प्रभाव पर पड़ता है। 

क्लोरोफ्लोरोकार्बन Chlorofluorocarbons (CFC) 

क्लोरोफ्लोरोकार्बन भी एक ग्रीनहाउस गैस है, जो अत्यधिक विषाक्त और अज्वलनशील होती है। यह कार्बन तथा हैलोजन तत्वों से मिलकर बनी होती है

तथा रेफ्रिजरेटर, प्लास्टिक और फौम के उद्योग तथा वतानुकूलित संयंत्रों से निकलती है। इस गैस का 20 प्रतिशत योगदान ग्रीन हाउस प्रभाव में रहता है।

औद्योगीकरण तथा वनो का विनाश Industrialization and deforestation 

औद्योगीकरण तथा वनों का विनाश ग्रीन हाउस प्रभाव का सबसे प्रमुख कारण माना जाता है। औद्योगिकीकरण के द्वारा विभिन्न प्रकार की ग्रीन हाउस गैस कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन के साथ ही क्लोरोफ्लोरोकार्बन उत्पन्न हो रही हैं।

जीवाश्म ईंधन के लगातार दहन से ग्रीन हाउस गैसों का उत्पन्न होना, ग्रीन हाउस प्रभाव का कारण माना जाता है। एक अनुमान के द्वारा बताया गया है,

कि वर्तमान समय में प्रतिवर्ष 4000 अरब टन ईंधन की खपत होती है और 4% कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि इसी के कारण होती है।

वैज्ञानिकों के विश्लेषण के आधार पर बताया गया, कि पिछले 50 वर्षों में वायुमंडल का तापमान 0.5-0.7 डिग्री सेंटीग्रेड ग्रीन हाउस गैसों के कारण बढ़ चुका है।

दिन प्रतिदिन जनसंख्या वृद्धि के कारण मानव ने वनों का विनाश शुरू कर दिया, और अभी भी बस्तियाँ बनाने के लिए तथा औद्योगिककरण के लिए वनों का विनाश लगातार किया जा रहा है।

एक अनुमान के आधार पर बताया गया है, कि इस समय लगभग प्रतिवर्ष 7 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्रों का विनाश होता जा रहा है।

जबकि हरे पौधे प्रकाश संश्लेषी होते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड का विघटन करते हैं तथा ऑक्सीजन गैस मनुष्य तथा जीव जंतुओं के लिए प्रदान करते हैं।

वनों के कम होने से लगातार कार्बन ऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है तथा पर्यावरण असंतुलित होता जा रहा है। 

ग्रीन हाउस प्रभाव से हानि Loss due to green house effect

पौधों में उर्वरण प्रभाव Fertilization effect in plants

ग्रीन हाउस प्रभाव गैस अर्थात कार्बन डाइऑक्साइड की अत्यधिक मात्रा के कारण C3 पौधौं में विकास की दर 30% से भी अधिक हो जाएगी।

कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने के कारण पेड़ पौधों में प्रकाश संश्लेषण की दर बढ़ जाएगी, वाष्प उत्सर्जन में कमी आने लगेगी

जल उपयोग की क्षमता बढ़ेगी और कम जल में ही पेड़ पौधों को उगाया जा सकेगा। इससे भोज्य पदार्थ अधिक मात्रा में बनेंगे और जड़े विकसित होने लगेंगी।

वाष्पीकरण की दर भी बढ़ जाएगी  से कार्बन डाइऑक्साइड नामक ग्रीनहाउस गैसेस पौधों में पूर्ण प्रभाव को प्रभावित करेगी।

जलवायु पर प्रभाव Impact on climate

ग्रीन हाउस गैसों के वायुमंडल में बढ़ जाने के कारण तापमान में वृद्धि होती है, जो बीसवीं शताब्दी में 0.7°C तक बढ़ गई है। जिसके कारण उत्तरी गोलार्ध में जाड़े और वर्षा में वृद्धि, उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में वर्षा की कमी हुई है।

खाद्य उत्पादन पर प्रभाव Impact on food production

ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण खाद उत्पादन में भी कमी देखने को मिलती है। क्योंकि ग्रीन हाउस प्रभाव में वृद्धि होने के कारण स्वसन क्रिया की दर बढ़ जाती है।

जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के व्याधि उत्पन्न होने लगती हैं, यह उत्पादक पौधों के द्वारा उत्पादन में कमी लाते हैं।

एक रिसर्च के अनुसार बताया गया है कि दक्षिण पूर्व एशिया में 1% तापमान में वृद्धि होने के कारण 5% से भी अधिक चावल उत्पादन में कमी देखी गई है।

ओजोन हास Ozone loss

ग्रीन हाउस गैसों के द्वारा ओजोन परत का हास भी होता है। ओजोन परत समतापमण्डल में 50 किलोमीटर ऊपर तक समताप मंडल में पाए जाने वाली ऑक्सीजन का अपररूप है,

जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को रोकती है, उन्हें अवशोषित करने का गुण रखती है। किन्तु विभिन्न क्रियाओं के कारण उत्पन्न क्लोरोफ्लोरोकार्बन

हेलोकार्बन आदि के कारण ओजोन परत का लगातार हास होता जा रहा है। अंटार्कटिका में हैली वे केंद्र ने ओजोन परत पर अपने सर्वेक्षण किये और उन्होंने बताया कि 1956-1974 में अंटार्कटिका के ऊपर

ओजोन परत की मोटाई 208-325 डाबसन के आसपास थी। जो 1979 में 225 डाबसन रह गई। 1985 में 180 डाबसन तथा 1994 में 94 डाबसन ही रह गई।

अंटार्कटिका पर सबसे पतली परत को 1985 में खोजा गया जिसे ओजोन छिद्र के नाम से जाना जाता है। ओजोन परत के हास होने के परिणाम स्वरुप त्वचा का कैंसर, मोतियाबिंद की बीमारी

रोगप्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है, न्यूक्लिक अम्ल प्रभावित होता है, तथा पेड़ पौधों, जीव जंतुओं में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। 

हरित गृह प्रभाव पर नियंत्रण Control of green house effect

हरित गृह प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए निम्न प्रकार की विधियों का प्रयोग में लाया जाना उपयोगी सिद्ध होगा:- 

हरित गृह प्रभाव कम करने के लिए सबसे पहले अधिक से अधिक संख्या में वृक्षारोपण और वनारोपड़ करना होगा। ताकि कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता को नियंत्रित किया जा सके।

जीवाश्म ईंधन के अधिक से अधिक उपयोग करने पर रोक लगानी चाहिए, तथा इसके दूसरे विकल्पों जैसे कि गैर परंपरागत ऊर्जा के स्रोत आदि का उपयोग किया जाना चाहिए। जिससे काफी मात्रा में ग्रीन हाउस प्रभाव को कम किया जा सकता है।

खेतों में जैविक खाद का उपयोग किया जाना चाहिए, तथा नाइट्रोजन उर्वरकों का उपयोग करने पर रोक लगा देनी चाहिए। जिससे नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा को कम किया जा सके।

क्लोरोफ्लोरोकार्बन गैस उत्पन्न करने वाले विभिन्न संयंत्रों पर रोक लगा देनी चाहिए। इसके साथ ही उन उपकरणों का उपयोग बंद कर देना चाहिए,

जिनसे क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसी गैस उत्पन्न होती हैं, इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई प्रकार के समझौते भी किए गए हैं

जैसे मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol) आदि इन पर सभी देशों को गंभीरता से विचार करने चाहिए नियम बनाने चाहिए और उनको अपने देश में लागू भी करना चाहिए।

ग्रीनहाउस गैसों को कम करने के लिए संपूर्ण विश्व के लोगों को एक साथ मिलकर प्रयास करना चाहिए। इसके लिए देश विदेश में कई वार्तायें सम्मलेन हुए है और हो रहे है, जैसे 1997 में जापान में हुआ क्योटो प्रोटोकोल (Kyoto Protocol) आदि को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

दोस्तों आपने इस लेख में हरित गृह प्रभाव क्या है (what is green house effect) कारण निवारण आदि कई तथ्यों के बारे में पड़ा। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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