फाह्यान का भारत वर्णन phaahyaan ka bhaarat varnan

फाह्यान का भारत वर्णन


फाह्यान का भारत वर्णन phaahyaan ka bhaarat varnan

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है, आज के हमारे इस लेख फाह्यान का भारत वर्णन (India description of Fahien) में। दोस्तों यहाँ पर आप चीनी यात्री फाहियान का यात्रा विवरण के साथ ही फाह्यान कौन था?

फाह्यान भारत कब आया था? आदि के बारे में जान पायेंगे। तो आइए दोस्तों करते हैं आज का यह लेख शुरू फाह्यान का भारत वर्णन:-

तक्षशिला विश्वविद्यालय का इतिहास

फाह्यान कौन था Who was Fahien

मौर्य सम्राट अशोक (Ashoka) तथा कुषाण सम्राट कनिष्क के महानतम प्रयास के द्वारा बौद्ध धर्म का तीव्र गति से प्रचार-प्रसार होना प्रारंभ हो गया था,

जिस कारण भारत के प्रत्येक क्षेत्र तथा आसपास के देशों में भी बौद्ध धर्म की महानता का घोष सुनाई दे रहा था। भारत के आसपास के क्षेत्र जैसे कि

चीन का तिब्बत क्षेत्र, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा अन्य देशों में भी बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार अपने उच्च स्तर पर था।

उसी समय चीन के विभिन्न विधद्वान् यात्रियों ने भारत की यात्रा की ताकि वे बौद्ध धर्म संबंधी अनेक जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त कर सकें और विस्तृत रूप से बौद्ध धर्म के बारे में जान सकें।

उन्हीं यात्रियों में से एक यात्री था जिसका नाम था 'फाह्यान' फाह्यान का जन्म चीन के वु-यंग नामक एक स्थान पर हुआ था। उसका बचपन का नाम कुड़ था।

फाह्यान के पिता बौद्ध धर्म के अनुयायी और महान प्रशंसक थे, इसलिए उसने अपने पुत्र को भी बौद्ध धर्म (Buddhism) की शिक्षा प्रदान की।

यह बात उस समय की है, जब बचपन की अवस्था में फाह्यान किसी गंभीर रोग के द्वारा बीमार पड़ गया, कई हकीम और वैध की दवाओं के पश्चात भी उसे कोई भी आराम नहीं मिला।

अंततः फाह्यान के पिता ने फाह्यान को चीन के ही बौद्ध मठ में भेज दिया, जहाँ पर बौद्ध भिक्षुओं की सेवा और उपचार के कारण फाह्यान बहुत ही जल्दी पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया।

इस चमत्कार के कारण फाह्यान पर गहरा प्रभाव पड़ा और वह बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुआ। उसमें बौद्ध धर्म के बारे में विस्तार से जानने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हो गई। इसलिए उसने बौद्ध मठ में रहकर शिक्षा ग्रहण करने का निश्चय बना लिया।

तथा लम्बे समय तक बौद्ध मठ में शिक्षा ग्रहण करने के बाद उनका प्रवज्या संस्कार (Pravajya Sanskar) पूर्ण हुआ, तभी से उनका नाम फाह्यान पड़ गया।

जिसमें फा का अर्थ 'धर्म' और हियान का अर्थ होता है 'आचार्य' इस प्रकार से फाह्यान का अर्थ होता है 'धर्माचार्य' फाह्यान ने कई वर्षों तक चीन में बौद्ध धर्म की शिक्षा प्राप्त की।

किंतु उसे लगने लगा कि बौद्ध धर्म उद्गम स्थल भारत देश है और चीन में बौद्ध धर्म का ज्ञान अल्प मात्रा में हैं। इसलिए उसने भारत की यात्रा करने का निश्चय किया। और भारत के लिए प्रस्थान कर गया। 

फाह्यान भारत कब आया था When did Fahien come to India?

फाह्यान ने भारत की यात्रा 399 ई• में आरंभ की थी तथा लगातार 414 ईसवी तक भारत में विभिन्न बौद्ध मठों और केंद्रों का भ्रमण किया तथा बौद्ध धर्म के बारे में ज्ञान प्राप्त किया।

चीन से यात्रा प्रारम्भ करके फाह्यान सबसे पहले शन शन प्रदेश में पहुँचा। इसके पश्चात वह यात्रा करता हुआ कर प्रदेश पहुँचा और वहाँ से खेतान पहुँच गया।

जहाँ पर उसने 14 बौद्ध मठों में रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं से विभिन्न प्रकार के स्रोतों से ओतप्रोत ज्ञान प्राप्त किये। खेतान के बाद वह काशगर और काशगर के बाद वह पुष्पकलावती पहुँच गया,

यहाँ पर एक स्तूप था और उसका उल्लेख फाह्यान ने अपने ग्रंथ में किया। इसके बाद वह यात्रा करता हुआ बौद्ध धर्म नगरी तक्षशिला पहुँचा और वहाँ से पेशावर गया। जहाँ उसने कनिष्क के द्वारा निर्मित 400 फुट ऊंचा बौद्ध स्तूप देखा।

तत्पश्चात वह पंजाब, मथुरा, मध्य प्रदेश, श्रावस्ती, कन्नौज, कपिलवस्तु, राजगृह, कुशीनगर से होता हुआ वैशाली, काशी, बोधगया, नालंदा तथा पाटलिपुत्र पहुँचा।

उसने इन सभी स्थानों से बौद्ध धर्म से संबंधित विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। अंत में वह ताम्रपाली बंदरगाह पहुँचा जहाँ से होता हुआ

श्रीलंका और श्रीलंका से होते हुए चीन वापस लौट गया। इस प्रकार से फाह्यान चीन से भारत थल मार्ग द्वारा आया और जल मार्ग द्वारा चीन वापस चला गया। 

फाह्यान का भारत वर्णन India description of Fahien

फाह्यान बौद्ध धर्म के प्रति इतना आकर्षित था कि उसे अन्य किसी भी प्रकार की वस्तुओं के बारे में वर्णन करने की कोई भी रुचि उत्पन्न नहीं हुई।

उसने मात्र बौद्ध धर्म के ज्ञान प्राप्ति तथा उसके अवशेषों को संलग्न करने में अपना संपूर्ण समय बिता दिया। यहाँ तक की उसने अपने ग्रन्थ में वर्तमान सम्राट अर्थात

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में रहकर उनके नाम का भी उल्लेख नहीं किया। फाह्यान का यात्रा वृतांत फो-क्वो-की नामक ग्रंथ के रूप जाना जाता है। फाह्यान ने तत्कालीन भारत की दशा का निम्न प्रकार से वर्णन किया है:- 

राजनीतिक दशा Political situation

फाह्यान ने उस समय की राजनीतिक दशा का वर्णन बहुत ही सरल शब्दों में किया कि उस समय की राजनीतिक दशा बहुत ही सरल और उदार हुआ करती थी। उस समय भारत का सम्राट

ब्राह्मण धर्म का उपासक था तथा शासन प्रबंध सुव्यवस्थित तरीके से चलता था। उस समय का शासक उधार थे, इसलिए शासन भी उदार हुआ करता था।

व्यक्तिगत कर नहीं लगाए जाते थे तथा व्यक्तियों को अपने घर और कुलों का पंजीकरण भी नहीं कराना होता था। उस समय की दंड संहिता सरल और उदार हुआ करती थी। जो अपराधी होते थे

उनके साथ उदारता का व्यवहार होता था। अपराध के मापदंड के आधार पर ही लोगों को सजा दी जाती थी। किन्तु किसी प्रकार की शारीरिक यातनाएँ उस समय नहीं थी।

चोरी, डकैती, लूटपाट, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि उपलब्ध नहीं था। राजा और प्रजा का कहीं पर भी आने जाने पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होता था।

महिलाएं स्वतंत्र रूप से जीवनयापन करती थी। उस समय चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में जनता सुखी सम्पन्नता से रह रही थी।

पाटलिपुत्र की स्थिति Status of Patliputra

फाह्यान लगभग 3 वर्ष पाटलिपुत्र में रहा। उसने अपने यात्रा वृतांत में पाटलिपुत्र के बारे में विभिन्न प्रकार की बातें भी लिखी हैं।

उसने अपनी यात्रा वृतांत में बताया है, कि पाटलिपुत्र में दो विशाल और सुंदर बिहार हुआ करते थे, जिनमें एक हीनयान और दूसरा महायान शाखा से सम्बंधित था।

इन बिहारों में लगभग 700 से 800 बौद्ध भिक्षु रहा करते थे। जो बड़े विद्वान हुआ करते थे। भारत तथा देश के प्रत्येक क्षेत्र से लोग उनके दर्शन करने के लिए तथा ज्ञान अर्जन करने के लिए वहाँ आते-जाते रहते थे।

फाह्यान ने सम्राट अशोक के राजभवन के बारे में भी उल्लेख किया है और उस राजभवन के वैभव को देखकर वह आश्चर्यचकित भी हुआ है।

उसने कहा है, कि सम्राट अशोक के राज भवन की सुंदरता इस प्रकार थी कि मानो यह भवन देवी शक्तियों के द्वारा निर्मित किया गया हो।

मुख्य गावों और शहरों में चिकित्सालय (Hospital) थे जिनका संचालन गांव तथा शहर के समृद्ध लोगों के द्वारा किया जाता था।

जहाँ पर निर्धन रोगियों को भोजन और दवाएँ बिल्कुल मुफ्त में दी जाती थी। बड़े-बड़े नगरों में मुख्य मार्गों और राजमार्गों पर विश्राम के लिए धर्मशालाएँ (Dharmshalayen) बनाई जाती थी।

सामाजिक स्थिति Social Situation 

सामाजिक स्थिति का वर्णन करते हुए फाह्यान ने अपने यात्रा वृतांत में उस समय की सामाजिक स्थिति के प्रशंसा के पुल बांध दिए है।

उसने भारतीय सामाजिक स्थिति की अत्यंत प्रशंसा की है। उस समय के लोग अतिथि को भगवान मानते थे उनमें दया तथा धार्मिक प्रवृत्ति अत्यंत प्रबल हुआ करती थी। उस समय की जनता अधिकतर शाकाहारी हुआ करती थी,

अहिंसात्मक नीति का पालन सभी लोग करते थे। लोग मांस, मछली, लहसुन आदि का प्रयोग ना के बराबर करते थे।

किन्तु कुछ नीची जाति के लोग मांस का भक्षण करते थे परन्तु उनको नगर में आमतौर पर प्रवेश का अधिकार नहीं था। जब वे नगर में आते थे

तो किसी भी प्रकार का शोर करते थे ताकि अन्य लोग उनसे दूर रहें। फाह्यान भारतीय उत्सव समारोह संस्कृति को अधिक महत्त्व देता है।

भारतीय उत्सवो, त्योहारों, संस्कृति आदि की लगातार प्रशंसा करते हुए उनका अद्भुत वर्णन उसने अपने यात्रा वृतांत में किया है।

उस समय विभिन्न पवित्र उत्सव पर समारोह आयोजित किए जाते थे, मेले लगाए जाते थे तथा जुलूस निकाले जाते थे। उस समय चारों तरफ हर्ष और उल्लास का वातावरण छाया रहता था।

आर्थिक स्थिति Economical situation 

फाह्यान ने आर्थिक स्थिति के बारे में बताया है, कि उस समय की आर्थिक स्थिति बड़ी ही सुदृढ़ थी। उस समय व्यापार अधिक विकसित हुआ करता था तथा व्यापारिक संबंध एक देश से दूसरे देश से भी हुआ करते थे।

भारत के भी पडोसी देशों से व्यापारिक सम्बन्ध थे। चीन से रेशम आयात की जाती थी इसके साथ ही भारत में उपजाने वाले विभिन्न प्रकार की फसलों का निर्यात भी विदेशों में तथा आसपास के देशों में हुआ करता था।

उस समय क्रय-विक्रय के लिए छोटी मुद्राओं और कौड़ियों का प्रयोग अधिक होता था। गांव में अधिकतर लोग किसान हुआ करते थे जो अपने खेतों में विभिन्न प्रकार की फसलें उपजाया करते थे

जबकि कुम्हार, लोहार, जुलाहा आदि भी अपने अपने कर्मों में व्यस्त रहते थे और अपना जीवन सुख शांति से व्यतीत करते थे। 

धार्मिक स्थिति Religious situation 

फाह्यान ने अपने यात्रा वृतांत में वर्णन किया कि, उस समय भारत में विभिन्न प्रकार के धर्म उपस्थित थे। फाह्यान केवल बौद्ध धर्म और उनके ग्रंथों का अध्ययन करने के लिए भारत में आया था।

किंतु उसे बौद्ध धर्म के साथ ही विभिन्न प्रकार के धर्मों के बारे में जानकारी प्राप्त हुई। मध्य प्रदेश में ब्राह्मण धर्म उन्नत अवस्था में था, तो अन्य क्षेत्र पर शैव धर्म की आभा देखने को मिल जाती थी।

इसके साथ ही जैन धर्म की झलक दिखाई देती थी। ब्राह्मण व बौद्ध धर्म के लोगों में किसी भी प्रकार का वैर भेदभाव नहीं दिखाई देता था सब लोग ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते थे।

दोस्तों आपने यहाँ फाह्यान का भारत वर्णन (India description of Fahien) पड़ा। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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  2. कुषाण वंश का संस्थापक कौन था
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