स्किनर का क्रिया प्रसूत सिद्धांत Skinner's kriya Prasoot theory

स्किनर का क्रिया प्रसूत सिद्धांत Skinner's kriya


स्किनर का क्रिया प्रसूत सिद्धांत Skinner's kriya Prasoot theory

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख स्किनर का क्रिया प्रसूत सिद्धांत (Kriya Prasoot theory of Skinner) में। दोस्तों इस लेख में आप बाल विकास के महत्वपूर्ण टॉपिक स्किनर का क्रिया प्रसूत सिद्धांत समझ पायेंगे।

दोस्तों यह सिद्धांत यूपीटेट, सीटेट तथा अन्य कई शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में पूँछा जाता है। तो दोस्तों आइये करते है, यह लेख शुरू स्किनर का क्रिया प्रसूत सिद्धांत:-

बौद्धकालीन शिक्षा की विशेषताएँ

स्किनर कौन था who was skinner 

स्किनर का पूरा नाम बुर्ह फ्रेडरिक स्किनर (Burh Frederick Skinner) था। जिनका जन्म 20 मार्च 1904 में संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ था। स्किनर बचपन से ही प्रखर बुद्धि के थे।

स्किनर ने हावर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। वे अपने समय के एक महान मनोवैज्ञानिक, लेखक तथा सामाजिक दार्शनिक थे। उन्होंने कई बड़े - बड़े पदों पर कार्य किया तथा सीखने के सिद्धांत दिए। उन्होंने अपना प्रयोग चूहों पर किया। 

स्किनर का सिद्धांत Theory of Skinner 

स्किनर ने अधिगम के क्षेत्र में अनेक प्रयोग किये तथा अपने प्रयोगों के आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि अभिप्रेरणा से उत्पन्न क्रियाशीलन ही सीखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण और उत्तरदाई कारक है।

उन्होंने 2 प्रकार की क्रियाओं पर अध्ययन किया जो क्रिया प्रसूत और उद्दीपन प्रसूत है। जिनमें क्रिया प्रसूत का सम्बन्ध किसी ना किसी प्रकार के उत्तेजना से होता है तथा उद्दीपन प्रसूत का संबंध उन क्रियाओं से होता है जो क्रियाये उद्दीपन के कारण होती हैं।  

स्किनर का क्रिया प्रसूत सिद्धांत का प्रयोग Skinner ka kriya prasoot sidhant ka prayog 

स्कीनर ने अपना प्रयोग चूहों पर किया था। उन्होंने एक लीवर वाला बॉक्स बनवाया जिसका नाम स्किनर बॉक्स (Skinner box) रखा गया।

जैसे ही चूहा लीवर पर पैर रखता था एक खट्ट की आवाज होती थी इस आवाज को सुनने के बाद चूहा आगे बढ़ता और उसे आगे किसी प्याले में भोजन मिल जाता था। यह भोजन ही चूहे के लिए प्रबलन का स्रोत बनने लगा।

जब चूहा भूखा हुआ करता था, तब वह लीवर को दबाता तथा आगे बढ़ जाता था और उसे भोजन प्राप्त होता था। इस प्रयोग के आधार पर बताया जाता है, कि जब कोई प्राणी स्वयं वांछित व्यवहार करता है

तब व्यवहार के परिणाम स्वरूप उसे पुरस्कार प्राप्त होने लगता है। किन्तु अन्य व्यवहारों को करने के कारण उसे कोई भी पुरस्कार प्राप्त नहीं होता इसलिए वह पुरस्कार प्राप्त करने वाला व्यवहार आसानी से सीख जाता है।

इस प्रयोग से निष्कर्ष निकलता है, यदि क्रिया के बाद कोई बल दिया जाए तो वह बल उद्दीपन का कार्य करता है। और उस क्रिया की शक्ति में वृद्धि हो जाती है। 

कक्षा शिक्षण में महत्व Importance in classroom teaching

स्किनर का क्रिया प्रसूत सिद्धांत सीखने की प्रक्रिया में विभिन्न प्रकार से मदद करता है।

इस सिद्धांत के द्वारा बालकों के शब्द भंडार में वृद्धि आसानी से की जा सकती है।

इस सिद्धांत के द्वारा जो व्यवहार सीखा गया है, शिक्षक उस व्यवहार को स्वरूप प्रदान कर सकता है, तथा उद्दीपन पर नियंत्रण करके वांछित व्यवहार का सृजन किया जा सकता है।

शिक्षण के क्षेत्र में इस सिद्धांत का उपयोग करके सीखने की गति बढ़ती है और सफलता भी मिलती है।

जब भी किसी कार्य में सफलता मिलती है, तो उससे संतुष्टि होती है तथा यह संतुष्टि क्रिया को बल देती है। जिससे क्रिया और अधिक मजबूत हो जाती है।

इस सिद्धांत के द्वारा मानसिक रोगियों को भी सीखने के अवसर प्राप्त होते हैं। 

दोस्तों इस लेख में आपने स्किनर का क्रिया प्रसूत सिद्धांत (Kriya Prasoot theory of Skinner) पड़ा आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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