द्विनाम पद्धति क्या है वह किसने प्रतिपादित की what is binomial system

द्विनाम पद्धति क्या है वह किसने प्रतिपादित की

द्विनाम पद्धति क्या है वह किसने प्रतिपादित की what is binomial system 

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख द्विनाम पद्धति क्या है वह किसने प्रतिपादित की में।

दोस्तों इस लेख में आप जंतुओं के नामकरण की द्विनाम पद्धति पड़ेंगे। साथ ही आप जानेंगे कि त्रिनाम पद्धति क्या है

द्वीनाम नामकरण पद्धति के नियम क्या है। तो आइये दोस्तों करते है शुरू द्विनाम पद्धति क्या है वह किसने प्रतिपादित की:-

कोशिका किसे कहते है 

द्विनाम पद्धति क्या है वह किसने प्रतिपादित की what is binomial system

जंतु जगत में लगभग 12.5 प्रकार की प्रजातियाँ हैं, जिसमें कुछ ऐसी प्रजातियाँ शामिल की गई है जो विलुप्त हो चुकी हैं और कुछ ऐसी प्रजातियाँ भी है जो विलुप्त होने की कगार पर हैं।

इसलिए जंतु जगत एक बहुत विशाल जगत है। जंतु जगत की विचित्रता तथा विविधता जंतुओं के द्वारा प्रदर्शित की जाती है।

जंतुओं के द्वारा प्रचलन, वृद्धि, उपापचय, उद्दीपन और प्रजनन आदि सभी क्रियाएँ प्रदर्शित की जाती है। जिस आधार पर जीवित और अजीवित में अंतर कर पाते हैं।

इसीलिए जंतु वैज्ञानिकों ने समय-समय पर सभी प्रकार के जंतुओं को लक्षणों की समानता, असमानता और तथा भौगोलिक वितरण के आधार पर विभिन्न

श्रेणियों में बांटा है। ताकि उनका अध्ययन आसानी से किया जा सके। इसके लिए जंतु वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं तथा वर्गीकरण प्रणाली को

अपनाया जिनमें से कृत्रिम वर्गीकरण प्रणाली जंतुओं के बाहरी लक्षण जैसे कि रंग,  रूप, आवास आदि पर व्यवस्थित वर्गीकरण प्रणाली थी।

इसके बाद प्रथम प्रकार का वर्गीकरण अरस्तु तथा और जॉन रे ने किया इसके बाद कैरोलस लीनियस ने (1707- 1778) जंतुओं का वैज्ञानिक तरीके से

वर्गीकरण किया उन्होंने अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी 1735 में विभिन्न जीव जंतुओं का द्विपद नामों के साथ वर्गीकरण किया और विधि प्रदान की

तथा 1758 में अपनी पुस्तक के दसवें संस्करण के बाद उनकी विधि को वर्तमान में स्थापित प्रणाली का आधार बताया गया। कैरोलस लीनियस को वर्गिकी विज्ञान का पिता कहा जाता है।

द्वीनाम पद्धति क्या है what is binomial system

संसार में लाखों जीव जंतु है और उनको विश्व भर में अलग-अलग नामों के द्वारा भी पुकारा जाता है। एक ही प्राणी के संसार के विभिन्न भागों में

विभिन्न भाषाओं में पृथक-पृथक नाम की विषमता को दूर करने के लिए सर्वप्रथम कैरोलस लीनियस ने अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी में जीव जाति के नामकरण की द्वीनाम पद्धति प्रतिपादित की।

कैरोलस लीनियस ने लैटिन भाषा तथा लेटिन भाषा के स्वरूप शब्दों का प्रयोग जीव जातियों के वर्गीकरण के लिए किया।

तथा उन्होंने प्रत्येक जाति को दोहरा नाम दिया। उन्होंने जीव का प्रथम नाम वंश का तथा दूसरा नाम जाति का दिया।

जिसमें उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वंश का नाम बड़े अक्षरों में और जाति का नाम छोटे अक्षरों में लिखा जाएगा।

जैसे मनुष्य का वैज्ञानिक नाम होमो सेपियंस है। तथा मनुष्य को विश्व के संपूर्ण भागों में होमो सेपियंस के नाम से ही पुकारा जाएगा।

जहाँ पर होमो वंश का नाम है और सैपियंस जाति का नाम है। इसी प्रकार से शेर को पेंथेरा लिओ तथा गौरैया को पैसर डोमेस्टिका के नाम से विश्व के संपूर्ण भागों में जाना जाएगा। 

त्रिनाम पद्धति क्या है what is trinomial system 

कुछ जीव जातियाँ ऐसी होती हैं, जो विभिन्न आबादियों में विभिन्न वातावरण में रहने के कारण कुछ आसमानता विकसित कर लेती हैं।

इसलिए कभी-कभी उन जाति की उपजातियों को निर्धारित करना अति आवश्यक हो जाता है। ऐसी स्थिति में विकसित असमान जातियों

को ही उपजाति मान लेते हैं। तथा उनका एक उपजातीय नाम निर्धारित करके वैज्ञानिक नाम के साथ जोड़ दिया जाता है।

जिससे उनका नाम तीन प्रकार के नामों से मिलकर बनता है, और इसे त्रिनाम पद्धति की कहा जाता है।

उदाहरण के लिए जैसे की कौवे का वैज्ञानिक नाम कोर्वस स्प्लेंडेन्स है, तथा यह जाति भारत, श्रीलंका वर्मा आदि देशों में पाई जाती है।

अतः इनमें भौगोलिक परिस्थितियों में परिवर्तन कारण कुछ असमानता उत्पन्न हो जाती हैं। इसलिए इनकी तीन उपजातियाँ बन गई

जिसमें उनका नाम भारतीय कोवे को कोर्वस स्प्लेंडेन्स स्प्लेंडेन्स श्रीलंका के कौवे को कोर्वस स्प्लेंडेन्स प्रोटीगैटस तथा बर्मा के कौवे को

कोर्वस स्प्लेंडेन्स आइसोलेंस कहा जाता है। कभी-कभी जंतु के नाम के पश्चात में खोजकर्ता का नाम भी जोड़ दिया जाता है। 

द्वीनाम नामकरण पद्धति के नियम rules of binomial nomenclature

नये जंतुओं की खोज होने के कारण वैज्ञानिक नामकरण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संहिता निर्धारित की गई। तथा कैरोलस लीनियस को द्वीनामकरण पद्धति का जनक माना गया।

उन्होंने जीवो की द्विनाम पद्धति का वर्णन अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी में किया। 1901 में बर्लिन में आयोजित पांचवी अंतरराष्ट्रीय जंतु वैज्ञानिक नामकरण कांग्रेस में जंतु नामकारण प्रस्तुत की गई।

तथा इनके मूल कोड को 1904 में मान्य कर लिया गया। वर्तमान में लागू जंतु नामकरण संहिता 1964 में 16वीं अंतर्राष्ट्रीय जंतु विज्ञान कांग्रेस वॉशिंगटन में परिवर्तनों के पश्चात लागू की गई जिसके नियम निम्न प्रकार से हैं:- 

द्वीनामकरण पद्धति के नियम rules of binomial nomenclature

अंतर्राष्ट्रीय जंतु विज्ञान कांग्रेस वॉशिंगटन में द्वीनामकरण पद्धति अंग्रेजी एवं फ्रेंच भाषा में प्रकाशित की गई थी, जिसके नियम निम्न प्रकार से हैं:-

  1. प्रत्येक जंतु का नामकरण लैटिन भाषा अथवा लैटिन भाषा से उत्पन्न होना चाहिए। 
  2. जाति से उच्च पदानुक्रम श्रेणी का नाम एक शब्दी ही होना चाहिए।
  3. जंतु की जाति का नाम द्विनाम होना चाहिए तथा उपजाति का नाम त्रिनाम होना चाहिए। 
  4. जंतु के वैज्ञानिक नामकरण में उसके आगे का नाम वंश का नाम बड़े अक्षरों में तथा पीछे का नाम जाति या उपजाति का छोटे अक्षरों में लिखा होना चाहिए।
  5. यदि किसी जंतु के उपवंश का नाम भी लिखना है, तो उसको वंश एवं जाति के मध्य कोष्ठक में लिखा जाना चाहिए।
  6. कुल के नाम के अंत में डिया जोड़ना चाहिए उदाहरण :- टिपुलिडिया तथा उपकुल के नाम के अन्त में इनी जोड़ना चाहिए। 
  7. वंश का नाम एकल संज्ञा होना चाहिए उदाहरण :- होमो, राना आदि।
  8. जाति का नाम विशेषण या एकल संज्ञा होना चाहिए उदाहरण:- राना टिग्रीना
  9. जंतु का नामकरण अन्य प्रकार की नामकरण पद्धतियों से अलग होना चाहिए।
  10. खोजकर्ता या लेखक का नाम जंतु के नाम का भाग नहीं होता है, इसे पीछे विकल्प के रूप में लिखा होना चाहिए।
  11. यदि किसी जंतु के नाम दो या अधिक है तो उसके अन्य समनाम को कोष्टक में लिखा जाना चाहिए।

दोस्तों इस लेख में आपने द्विनाम पद्धति क्या है वह किसने प्रतिपादित की द्वीनाम नामकरण पद्धति के नियम पड़े। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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