चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) का इतिहास

चन्द्रगुप्त द्विक्रमादित्य का इतिहास History of Chandragupta Vikramaditya

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का इतिहास में। दोस्तों इस लेख में आप चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का इतिहास में चन्द्रगुप्त द्वितीय कौन था?

चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपलब्धियाँ, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नो के नाम आदि के बारे में जान पायेंगे। तो आइये दोस्तों करते है यह लेख शुरू चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का इतिहास:-

कुषाण वंश का संस्थापक कौन था इतिहास

चन्द्रगुप्त द्वितीय कौन था who was Chandragupta II

चंद्रगुप्त द्वितीय जिसे चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता है, गुप्त वंश का एक महान शासक था जिसकी स्थापना श्री गुप्त के द्वारा की गई थी।

चंद्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश के सबसे पराक्रमी शासक तथा भारत का नेपोलियन कहे जाने वाले समुद्रगुप्त का पुत्र और रामगुप्त का छोटा भाई था।

चंद्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश का छठवां शासक था जिसका शासनकाल 380 ईस्वी से 412 ईसवी तक माना जाता है। उनके अभी तक 6 अभिलेख ज्ञात है।

जिनमें मथुरा का स्तंभ लेख, मथुरा का शिलालेख, उदयगिरि से प्राप्त दो लेख, गढ़वा लेख और सांची का लेख शामिल है।

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने कई प्रकार की उपाधियाँ धारण की जिनका नाम मुद्राओं पर भी अंकित है। चंद्रगुप्त द्वितीय ने देवश्री, विक्रम, विक्रमादित्य, सिंहचंद्र

परमभागवत, शकारी, गडारी अजीतविक्रम सिंहविक्रम, विक्रमांक अप्रतिरथ, विरुदो जैसे उपाधि धारण की। चन्द्रगुप्त द्वितीय की राजधानी उज्जैयनी थी।

तथा इनके शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान आया था। चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में कला साहित्य स्थापत्य सभी प्रकार का विकास हुआ, इसलिए उनके शासनकाल को गुप्त वंश का स्वर्णयुग कहा जाता है। 

चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपलब्धियाँ Achievements of Chandragupta II

चंद्रगुप्त द्वितीय जिसे चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता था। गुप्त वंश का एक महान पराक्रमी शासक था।

जिसने अपने प्रताप के कारण कई बड़े-बड़े राजाओं को पराजित किया चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपने राज्य को दृढ़ता और शक्ति प्रदान करने के लिए कई राज्यों से वैवाहिक संबंध स्थापित किये तथा

उनके साथ मिलकर कई राज्यों पर आक्रमण किया और उन्हें अपने राज्य में मिला लिया। चंद्रगुप्त द्वितीय की प्रमुख उपलब्धियाँ निम्न प्रकार से:-

चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा विवाह संबंध Marriage Relations by Chandragupta II

गुप्त वंश के शासकों के द्वारा वैवाहिक संबंध स्थापित करना उनकी एक विशिष्ट नीति थी। चंद्रगुप्त प्रथम ने भी लिच्छवियों से विवाह संबंध स्थापित किए थे।

जिस कारण गुप्त साम्राज्य को शक्ति प्रदान हुई। प्रयाग प्रशस्ति से इस बात की पुष्टि होती है कि समुद्रगुप्त ने भी विदेशी राज्यों से कन्याओं को उपहार स्वरूप प्राप्त किया था।

इसलिए अपने पूर्वजों के समान ही चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी वैवाहिक संबंधों को अधिक महत्व दिया और समकालीन राजवंशों से वैवाहिक संबंध स्थापित किये जिनमें से कुछ निम्न प्रकार से हैं:-

नागवंश से संबंध

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने नागवंशी राजकुमारी कुबेरनागा से विवाह करके वैवाहिक संबंध स्थापित किए थे। गुप्त काल में नागवंश एक शक्तिशाली वंश था जिसकी शाखाएं भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शासन कर रही थी।

समुद्रगुप्त ने नागवंश की कुछ शाखाओं को पराजित भी किया। किंतु चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने वैवाहिक संबंध ही स्थापित करना उचित समझा। जिससे चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को काफी मदद और सैन्य शक्ति प्राप्त हुई।

वाकाटक वंश के संबंध

वाकाटक वंश दक्षिण का एक वंश था जो अत्यंत शक्तिशाली राजवंश था। वाकाटक वंश के राजा अत्यंत पराक्रमी हुआ करते थे और उनकी सैन्य शक्ति भी अत्यधिक प्रबल थी।

बताया जाता है, कि इसी कारणबस समुद्रगुप्त ने भी वाकाटक राजवंश पर आक्रमण नहीं किया। इसलिए चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने वाकाटक वंश से वैवाहिक संबंध स्थापित करना ही उचित समझा।

और उन्होंने अपनी पुत्री प्रभावती जो कुबेरनागा से उत्पन्न हुई थी, उसका विवाह वाकाटक वंश के राजकुमार रूद्रसेन द्वितीय से कर दिया।

इस संबंध के कारण वाकाटक राजवंश और गुप्त राजवंश ने मिलकर शकों पर विजयी प्राप्त की। रूद्रसेन द्वितीय की मृत्यु 390 ई में हो गई। तब प्रभावती ने वाकाटक वंश का संचालन किया।

कदंब वंश से संबंध

अन्य राजवंशों की तरह चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने कदम्ब वंश से वैवाहिक संबंध स्थापित किये। कदंब वंश कुंतल में राज्य कर रहा था।

काकुस्थ वर्मा कुंदन नरेश की राजकन्या का विवाह गुप्त वंश में हुआ था। इसकी चर्चा तालगुण्ड के अभिलेख से प्राप्त होती है। 

चन्द्रगुप्त द्वितीय की विजय Victory of Chandragupta II

चंद्रगुप्त द्वितीय ने राज्य विस्तार तथा राज्य की सुरक्षा के उद्देश्य से विभिन्न राज्यों से वैवाहिक सम्बन्ध, तथा युद्ध विजय को अपनाया। चंद्रगुप्त द्वितीय की प्रमुख विजय निम्न प्रकार से हैं:-

चंद्रगुप्त द्वितीय शक विजय

शकों पर विजय प्राप्त करना चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के जीवन की सबसे प्रमुख घटना रही है। क्योंकि शक शक्तिशाली राजा हुआ करते थे।

इसलिए समुद्रगुप्त ने भी शकों पर आक्रमण नहीं किया। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने वाकाटक शासकों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए और उनकी मदद से गुजरात के छेत्र

मालवा और सौराष्ट्र पर शकों को पराजित करके अपना अधिकार जमा लिया। इस विजय का उल्लेख हर्षचरित्र उदयगिरि से प्राप्त लेख, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की मुद्राओं, तथा शकों की मुद्राओं से प्राप्त होता है। 

गणराज्यों पर विजय

चंद्रगुप्त से पहले समुद्रगुप्त ने कई गणराज्यों पर अपनी विजय प्राप्त की थी। किन्तु समुद्रगुप्त ने उन गणराज्यों को अपने अधीन नहीं किया। तथा वही के शासक को वहाँ का शासन चलाने के लिए कहा।

किंतु चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने गणराज्यों पर विजय प्राप्त करके उसे गुप्त साम्राज्य में मिला लिया। गणराज्यों के शासकों को बंदी बनाया तथा मृत्यु के घाट उतार दिया।

बाहीक विजय

बाहीक को कुछ विद्वान बैक्ट्रीया कहते है। विक्रमादित्य ने  सिंधु के पांच मुख को पार करके बाहीक पर विजय प्राप्त की थी।

उस समय बाहीक जाति भारतवर्ष के कुछ क्षेत्रों पर शासन कर रही थी और बाहीक उत्तरी कुषाणों को कहा जाता है, कुछ विद्वानों का यह मत है।

चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा बाहीक विजय का उल्लेख दिल्ली के महरौली स्तंभ से भी मिलता है। जबकि रामायण और महाभारत में भी कई विद्वानों ने यह बताया है,

कि पंजाब का वह भाग जो व्यास नदी के आसपास का था उस भाग को वाहीक नाम से भी जाना जाता था।

पूर्वी प्रदेशों पर विजय

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के द्वारा पूर्वी प्रदेशो पर विजय की जानकारी महरौली स्तंभ लेख से प्राप्त होती है। बताया जाता है, जब रामगुप्त शासक बना था तो उसकी दुर्बलता का लाभ उठाकर बंगाल

और पूर्वी प्रदेशों के शासकों ने एक संघ बना लिया था। तथा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने ही इस संघ को पराजित किया और पूर्वी प्रदेशों पर.अपना आधिपत्य जमाया। 

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नो के नाम Names of Navaratna of Chandragupta Vikramaditya

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य एक महान शासक था, इसलिए उस के दरबार में महान और विद्वान लोग रहा करते थे। जो ज्योतिष, साहित्य, विज्ञान, गणित तथा अन्य कई क्षेत्रों में पारंगत थे।

उनके दरबार में रहने वाले महान और विद्वान लोगों का एक समूह था जिसे नवरत्नों के नाम से जाना जाता था। जिनमें धन्वंतरि, क्षपणक, शंकु, वेताल भट्ट, घटखर्पर, वररुचि, अमरसिंह, वराहमिहिर, कालिदास शामिल थे। 

चन्द्रगुप्त द्वितीय के नवरत्न की ट्रिक Trick of Navratna of Chandragupta II

धन्वन्तरि क्षपणक, शंकु ने वैताल भट्ट को अमर घट के साथ वाहर को वुलाया

धन्वन्तरि - धन्वन्तरि

क्षपणक - क्षपणक

शंकु - शंकु

वैताल भट्ट - वैताल भट्ट

अमर - अमरसिंह

घट - घटखर्पर

वाहर - वराहमिहिर

को - कालिदास

वुलाया - वररुचि

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के बारे में रोचक तथ्य Interesting fact of Chandragupta II

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की पहली राजधानी पाटलिपुत्र तथा दूसरी उज्जैयनी थी।

इनके शासनकाल में चीनी यात्री बौद्ध फाह्यान आया था। जिसकी रचना फो क्यों की के नाम से है।

दिल्ली मेहरोली का लौह स्तम्भ चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का है, उसमें चंद्र और धाव नाम का उल्लेख है।

इतिहासकारों ने बताया है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने रामगुप्त की हत्या की तथा उसकी पत्नी ध्रुवामिनी से विवाह किया।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य और ध्रुवामिनी से एक पुत्री प्राप्त हुई जिसका नाम प्रभावती था।

प्रभावती का विवाह वाकाटक शासक रुद्रसेन से हुआ था,  और उनका एक पुत्र हुआ किसका नाम प्रवरसेन था।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने सबसे पहले रत्नजड़ित चांदी के सिक्के चलाये। किन्तु चन्द्रगुप्त द्वितीय के सबसे अधिक मात्रा में धनुर्धर आकृति के सिक्के भारत से प्राप्त हुए। 

दोस्तों इस लेख में आपने चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) का इतिहास, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की जीवनी पड़ी। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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