लिवर फ्लूक के लक्षण Symptoms of liver fluke


लिवर फ्लूक के लक्षण Symptoms of liver fluke

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लिवर फ्लूक इन हिंदी, लिवर फ्लूक के लक्षण, लिवर फ्लूक का जीवन चक्र आदि तथ्यों के बारे में जान पायेंगे। तो आइये दोस्तों शुरू करते है यह लेख लिवर फ्लूक के लक्षण:-

उभयचर वर्ग के लक्षण

लिवर फ्लूक इन हिंदी liver fluke in hindi

लिवर फ्लूक संघ प्लेटीहेलमाइंथेस के अंतर्गत आने वाला एक अकशेरुकी (Invertibrate) जीव है। लिवर फ्लुक के वंश का नाम फेसियोला है,

जो स्तनी प्राणियों अधिकतर टेट्रापोड़ में जैसे कि भेड़, बकरी, खरगोश, सूअर कुत्ते के साथ ही मनुष्य के यकृत और पित्त वाहिनी में उपस्थित होता है।

यकृत में उपस्थित होने के कारण ही इसका नाम लिवर फ्लूक या यकृत कृमि पड़ गया। लिवर फ्लूक का जीवन वृत्त दो पोषकों में पूरा होता है,

जिसमें प्रथम पोषक कशेरुकी जीव, तथा द्वितीयक पोषक अकशेरुकी जीव होते हैं। हमारे देश भारत में फेसियोला जिगेन्टिका, 

सभी कशेरुकी टेट्रापोड़ प्राणियों में, जबकि फेसियोला बस्की मनुष्य और सूअर की आंत में परजीवी (Parasite) के रूप में रहते हैं।

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लिवर फ्लूक के लक्षण Symptoms of liver fluke

लिवर फ्लूक को हिंदी में यकृत कृमि कहा जाता है, जो एक रोगजनक परजीबी होता है, तथा भेड़ जैसे टेट्रापोड़ के साथ मनुष्य की यकृत में पाया जाता है।

लिवर फ्लुक का शरीर चपटी पत्ती के समान होता है, जबकि लंबाई 2.5 cm से 3cm तक हो सकती है।

लिवर फ्लुक के शरीर के अग्र भाग पर सिर पाया जाता है, और शिखर पर मुखवर्ती चूषक और केंद्र में छोटा मुंह होता है। जबकि पीछे की तरफ अधर भाग पर अधर चूषक पाए जाते हैं।

लिवर फ्लुक का पाचन तंत्र जटिल होता है, जबकि इनमें गुदा नहीं पाई जाती। इन प्राणियों की आहार नाल (Alimentory Canal) मुख, ग्रसनी, ग्रसिका, दो भागों में बंटी हुई आंत में विभाजित होती है।

लिवर फ्लूक में श्वशन अंग (Respiration Organ) उपस्थित होते हैं, इन जीवो में अंत: परजीवी के रूप में अनोक्सी श्वशन होता है।

लिवर फ्लूक में उत्सर्जन में सहायता करने के लिए उत्सर्जन कोशिकाएं उत्सर्जन नालिकायें तथा ज्वाला कोशिकाओं के साथ अन्य संरचनाएँ होती हैं।

इस प्राणी का तंत्रिका तंत्र भली प्रकार विकसित होता है, लिवर फ्लूक में जननांग भली-भांति विकसित होते हैं, जबकि यह उभयलिंगी प्राणी होते हैं। 

यकृत कृमि का वर्गीकरण Classification of liver fluke 

लिवर फ्लुक को कशेरुकी प्राणियों के अन्तः परजीवी एक यकृत कृमि के रूप में जाना जाता है। यह संघ प्लेटीहेलमाइंथीज के अंतर्गत आने वाला जीव है, लिवर फ्लुक का वर्गीकरण निम्न प्रकार से है:-

वर्गीकरण Classification 

  1. संघ ( phylum ) - प्लेटीहेलमाइंथेस (Platyhelminthes)
  2. वर्ग ( class ) - डाइजीनिया ( digenea )
  3. वंश ( genus ) - फेसियोला ( fasciola )
  4. जाति ( species ) - हिपैटिका ( hepatica )

लिवर फ्लूक के लक्षण

लिवर फ्लूक का जीवन चक्र life cycle of liver fluke 

लिवर फ्लूक मनुष्य या भेड़ की आंत में पाया जाता है. जिसका जीवन चक्र पूर्ण होने में 3 से 4 माह का समय लग जाता है।

वयस्क लिवर फ्लूक पित्तवाहिनी में रहता है, जो एक बार में लगभग 25000 तक अंडे (Eggs) देता है। यह अंडे पित्तवाहिनी के द्वारा छोटी आंत से होते हुए बड़ी आंत में पहुँचते है।

और मलाशय के द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिए जाते है। यह अंडे किसी भी कारण या माध्यम से जल स्रोतों में पहुँच जाते है। जहाँ पर अंडे विकास करते है,

और उन अंडो से एक लार्वा निकलता है जिसे माइरेसीडियम लार्वा कहते है, जिसके ऊपर छोटे - छोटे सीलिया (Celia) होते तथा लार्वा को प्रचलन में सहायता करते है।

कुछ समय तक ये लार्वा जल में तैरता रहता है और फिर कुछ विशिष्ट प्रजाति के घोंघे (snail) के कवच में प्रवेश कर जाता है, और अपना विकास करता है।

अब यह माइरेसीडियम लार्वा स्पोरोसाइट कहा जाता है। कुछ समय पश्चात् यह स्पोरोसाइट घोंघे से बाहर जल में आ जाता है, जहाँ इसको रेडिया (Redia) नाम से जाना जाता है।

रेडिया जल में अपनी ग्रोथ करता है और फिर उसको सरकेरिया लार्वा कहने लगते है। सरकेरिया लार्वा जल में ही तैरता रहता है, पोषण प्राप्त करता है और शरीर विकास करता है।

जिसके कारण वह एक सिस्ट जैसा बन जाता है और अब उसे मैटासर्केरिया लार्वा कहते है। अब यह मेटासरकेरिया लार्वा जल के कुछ पौधों की स्किन त्वचा में प्रवेश कर जाता है

और इन पौधों को मनुष्य या भेड़ खाती है तो यह मैटासर्केरिया लार्वा मनुष्य या भेड़ के आमाशय में पहुँचता है

फिर पित्तवाहिनी में पहुँच कर वयस्क में परिवर्तित हो जाता है। और फिरसे अंडे देता है। इस प्रकार से लिवर फ्लूक का जीवन चक्र(Life cycle) पूर्ण होता है. 

दोस्तों आपने इस लेख में लिवर फ्लूक के लक्षण (Symptoms of liver fluke) के साथ लिवर फ्लूक का जीवन चक्र पढ़ा। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

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