बौद्ध कालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ Main features of Buddhist education

बौद्ध कालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ

बौद्ध कालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ Main features of Buddhist education

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है। इस लेख बौद्ध कालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ में। दोस्तों इस लेख में आप बौद्ध कालीन शिक्षा क्या है।

बौद्ध कालीन शिक्षा के गुण विशेषताएँ के साथ ही बौद्ध शिक्षा के दोष तथा प्रमुख केंद्रों के बारे जानेंगे। तो आइये पड़ते है। यह लेख बौद्ध कालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ:-

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009

बौद्ध शिक्षा क्या है what is Buddhist education

पाँचवी सदी में बौद्ध धर्म का उदय हुआ था। तथा छठी सदी में धार्मिक आंदोलन में बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ तथा सिद्धांतो की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

बौद्ध धर्म में त्रिरत्न अर्थात, बुद्ध, धम्म और संघ का अध्ययन जरूरी माना जाता है। यही त्रिरत्न मनुष्य के सर्वागीण विकास के साथ ही मनुष्य की मानसिक और नैतिक शक्ति को भी बल देते है।

बौद्ध शिक्षा मठो और विहारों में बौद्ध भिक्षुओ के द्वारा दी जाती थी। यहाँ पर आत्मशयम तथा अनुशासन के बल पर मोक्ष पर ध्यान केंद्रित कीया जाता था।

शिष्य गुरु सम्बन्ध मधुर था। शिष्य सामान्य और सरल जीवन व्यतीत करता था।

शैक्षिक अवसरों की समानता

बौद्ध कालीन शिक्षा के विशेषताएँ Main features of Buddhist education

बौद्ध कालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार से है:- 

बौद्ध संघ

बौद्ध कालीन शिक्षा के केंद्र संघ हुआ करते थे। इसलिए छात्रों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए संघ में प्रवेश करना पड़ता था। संघ में प्रवेश करने की प्रक्रिया ब्राह्मण कालीन प्रिक्रिया के समान ही होती थी।

प्रवेश के समय छात्र गुरु के सम्मुख पहुंचता था और शिष्य बनाने के लिए निवेदन करता था। जिस प्रकार से गुरु शिष्य की शिक्षा के प्रति उत्तरदाई होता था उसी प्रकार से शिष्य भी गुरु की सेवा के प्रति उत्तरदाई होता था। 

प्रवृज्या संस्कार 

प्रवृज्या संस्कार बौद्ध संघ में छात्र का प्रवेश कराने के समय होने वाला एक विशेष प्रकार का संस्कार था। जिसका अर्थ होता है बरहिगमन।

जब कोई भी छात्र बौद्ध संघ में शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रवेश करता है, तो उस समय प्रवृज्या संस्कार होता है। यह संस्कार बौद्ध संघ की एक मान्य प्रथा थी।

इस संस्कार के द्वारा छात्र अपने समस्त पारिवारिक और सांसारिक संबंध त्याग देता है। सभी प्रकार के वर्ण के लोग संघ में प्रवेश पा सकते थे।

और संघ में आने के बाद उसका कोई वर्ण नहीं रह जाता था। प्रवृज्या संस्कार के लिए कम से कम बालक की आयु 8 वर्ष होनी चाहिए फिर बालक के केश मुड़वाएँ जाते हैं, उसे पीले वस्त्र पहनाए जाते हैं

और सबसे बड़े भिक्षु के पास उसे ले जाया जाता है। जहाँ पर वह भिक्षु बालक को तीन मूल मंत्र बुद्धम शरणम गच्छामि, धम्मम शरणम गच्छामि, संघम शरणम गच्छामि का उच्चारण करने के लिए कहता है।

और उसे संघ में प्रवेश की अनुमति दे देता है। संघ में प्रवेश लेने के बाद उस छात्र को निम्न प्रकार के आदेशों का पालन भी करना पड़ता है, अर्थात उसे भगवान बुद्ध के द्वारा बताए गए अष्टांगिक मार्ग पर चलना पड़ता है।

छात्र को हिंसा ना करना, सत्य बोलना, चोरी ना करना संग्रह ना करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, बस्ता का त्याग कर देना कंचन कामनी का त्याग कर देना,

सुगंधित वस्तुओं का त्याग कर देना, असमय भोजन का त्याग कर देना, कोमल और आरामदाह शैय्या का त्याग कर देना के साथ ही अन्य प्रकार के आदेशों का पालन करना पड़ता था। 

उपसंपदा संस्कार

उपसंपदा संस्कार तब होता है, जब बालक की शिक्षा पूर्ण हो जाती है। बौद्ध संघ में बालक 12 वर्ष तक शिक्षा ग्रहण करता है और वह 20 वर्ष का हो जाता है।

तब उसको मठ के भिक्षुओं के सामने जाना होता है और संघ के सभी सदस्यों का बहुमत भी प्राप्त करना होता है। जब उसके पास अधिक बहुमत होता है, तो वह भावी जीवन जीने के लिए उप संपदा ग्रहण करता है।

संघ का पूर्ण रूप से स्थाई सदस्य भी कहलाता है। इस अवसर पर उसके सारे संसारी और पारिवारिक संबंध हमेशा के लिए टूट जाते हैं।

छात्रों की दिनचर्या

बौद्ध काल का छात्र जीवन भी बहुत ही कठोर हुआ करता था। जिस प्रकार से वैदिक कालीन छात्रों का जीवन सभी छात्रों को ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता था।

भोजन, वस्त्र, भिक्षा के लिए भी अनुशासन के अनुसार ही कार्य करना पड़ता था। सभी छात्रों को सादा भोजन, ध्यान करना प्रातः काल शौच आदि से निवृत होना, और भिक्षाटन के लिए अवश्य जाना पड़ता था

और जो भिक्षा प्राप्त होती थी वह मौन दीक्षा ही मांगी जाती थी और भिक्षा उतनी ही ली जाती थी जितनी आवश्यकता होती थी।

छात्रों के गुरु के प्रति बहुत कर्तव्य हुआ करते थे भोजन तैयार करना, गुरु को खाना खिलाना, गुरु के निवास की साफ सफाई करना,

भंडारग्रह की व्यवस्था ठीक प्रकार से देखना आदि, सभी कार्य छात्र ही किया करते थे। बिना गुरु की आज्ञा के कोई भी कार्य नहीं हुआ करता था।

पारस्परिक संबंध

छात्र और गुरु दोनों अपने अपने कर्तव्य का पालन ठीक प्रकार से किया करते थे। गुरु और शिष्य स्नेहपूर्ण संबंध रहते थे। गुरु को भी अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए संयम और तप का जीवन व्यतीत करना पड़ता था।

जबकि छात्र गुरु में श्रद्धा रखता था और गुरु छात्र को अपने पुत्रों के समान स्नेह भी देता था। सभी शिष्य अपने गुरु के कर्तव्य उसके प्रति जागरूक रहा करते थे। जबकि गुरु भी अपने शिक्षकों के प्रति दया भावना दिखाया करते थे।

शिक्षण विधियाँ 

बौद्ध कालीन शिक्षण विधियों में मौखिक शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाता था। छात्रों को प्रवचन भाषा श्रवण कंठसस्थीकरण आदि क्रियाओं का सहारा लेना पड़ता था।

प्रश्नोत्तर विधि वाद विवाद विधि भी प्रचलित थी। स्मरण करने पर अधिक जोर दिया जाता था। जबकि भिक्षु अपने ज्ञान में वृद्धि प्रकृति का निरीक्षण करके करते थे।

बौद्ध संघ में प्रवेश होने वाले छात्र भी देशाटन के लिए जाया करते थे। समय-समय पर व्यक्तियों के सम्मेलन हुआ करते थे और विशेषज्ञ व्यक्तियों को आमंत्रित किया जाता था।

शिक्षा का माध्यम

बौद्ध काल में शिक्षा का माध्यम संस्कृत के अलावा अन्य लोक भाषाओं को भी बनाया गया था। वैदिक साहित्य शास्त्र, पुराण

आदि का अध्ययन और अध्यापन संस्कृत भाषा के माध्यम से होता था। जबकि बौद्ध साहित्य के साथ ही लौकिक विषयों का अध्ययन और अध्यापन पाली भाषा में होता था।

बौद्ध काल में स्त्री शिक्षा

बौद्ध काल में स्त्री शिक्षा का पतन हो गया था। स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। कहा जाता है कि बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध स्त्रियों को सांसारिक कष्टों का कारण माना करते थे।

उन्होंने महिलाओं का प्रवेश संघ में वर्जित कर दिया था। किंतु अपने प्रिय शिष्य आनंद और अपनी मौसी प्रजापति गौतमी के कहने पर उन्होंने स्त्रियों के लिए एक अलग संघ की स्थापना की।

जिनके लिए कठोर नियम हुआ करते थे। पहले दो वर्ष उनके परीक्षा के काल होते थे। स्त्रियाँ किसी भी भिक्षु के साथ अकेले कभी नहीं मिल सकती थी। जब संघ के अन्य सदस्य अनुमोदन करते थे, तभी उन्हें स्थाई सदस्य माना जाता था।

सर्वसाधारण की शिक्षा

बौद्ध शिक्षा के केंद्र बौद्ध विहार और मठ हुआ करते थे।इनमें बौद्ध संघ में भिक्षुओं को ही शिक्षा व्यवस्था थी। संघो में जनसामान्य की शिक्षा व्यवस्था नहीं थी।

बड़े और मुख्य बौद्ध भिक्षु देशाटन के लिए जाया करते थे। जो जन सामान्य की धार्मिक समस्याओं का निवारण करते उन्हें नैतिक और धार्मिक उपदेश दिया करते,

धार्मिक सिद्धांतों का आचार संहिता के विषय में विभिन्न प्रकार से उन्हें शिक्षित किया करते, जन सामान्य में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार का कार्य बौद्ध धर्म में उनकी आस्था को जागृत कर दिया करते थे।

व्यवसायिक शिक्षा

बौद्ध धर्म में धार्मिक शिक्षा दी जाती थी। इसके साथ ही व्यवसायिक शिक्षा पर भी जोर दिया जाता था। बिहार में रहने वाले व्यक्तियों को सिलाई, बुनाई, कढ़ाई आदि की शिक्षा भी प्रदान की जाती थी.

जिससे वे अपने छोटे बड़े कार्य स्वयं पूरे कर सके और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति भी कर सकें। बाद में उन्हें घर निर्माण की कला के साथ ही मठ और बिहार की मरम्मत व निर्माण में प्रशिक्षित कर दिया जाता था।

इसके साथ ही उनको अंकगणित, वास्तुकला, शिल्पकला, मूर्तिकला, चित्रकला, कृषि शिक्षा भी प्रदान की जाती थी। जिससे कुछ जीविकोपार्जन भी संभव हो सके। 

बौद्ध शिक्षा व्यवस्था का पाठ्यक्रम 

बौद्ध शिक्षा में पहले धार्मिक शिक्षा ही दी जाती थी। किंतु बाद में इसमें लौकिक शिक्षा का भी समावेश कर दिया गया। प्राथमिक शिक्षा घर पर ही दी जाती थी।

जिसमें 3 वर्ष से प्राथमिक शिक्षा शुरू हो जाती थी। जिसमें विद्यार्थियों को 49 अंको वाली सिद्धि वस्तु पुस्तक का अध्ययन करना पड़ता था।

बाद में उसे व्याकरण, चिकित्सा के साथ ही तर्कशास्त्र, दर्शन आदि का भी अध्ययन करना पड़ता था। शिक्षा का माध्यम पाली भाषा हुआ करती थी।

उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार केवल बौद्ध भिक्षुओं को ही था। उन्हें विभिन्न विषयों की तरह ही सामान्य ज्ञान के अलावा किसी एक विषय का विशिष्ट ज्ञान प्रदान किया जाता था।

व्याकरण धार्मिक दर्शन ज्योतिष और औषधीशास्त्र आदि सामान्य ज्ञान प्राप्त करने के स्रोत थे। इन्हीं विषयों में से किसी एक का विस्तृत अध्ययन विस्तृत ज्ञान बौद्ध भिक्षु को करना पड़ता था।

बौद्ध शिक्षा के महत्वपूर्ण गुण Important Features of Buddhist Education

बौद्धकालीन शिक्षा के महत्वपूर्ण गुण निम्नप्रकार है:- 

बौद्धकालीन शिक्षा प्राप्त करने के द्वार सभी वर्ग के व्यक्तिओं के लिए खुले थे।

बौद्धकाल में पहले महिलाओं के लिए शिक्षा नहीं थी किन्तु बाद में शिक्षा के द्वार महिलाओं के लिये भी खुल गए।

बौद्धकाल में बौद्ध भिक्षु किसी भी जाति एवं वर्ण का व्यक्ति बन सकता था तथा वह आदरणीय भी होता था।

बौद्धकाल में आपराधिक कार्य करने वाले व्यक्तियों को शिक्षा पाने का अधिकार नहीं था।

प्रव्रज्या संस्कार बौद्ध संघ में प्रवेश के समय होता था। तब बालक अपने आध्यात्मिक गुरु का चयन करता था। तथा उनसे शिक्षा प्राप्त करता था। 

बौद्धकाल में ब्रह्मचर्य आश्रम पर सर्वाधिक बल दिया जाता था। शिष्य को गुरु के लिये अनेक सेवाकार्य भी करने पड़ते थे।

शिष्य गुरु के दोष बता सकते थे जबकि गुरु शिष्य सम्बन्ध मधुर थे। 

योग्यता-प्रदर्शन के अनुसार भिक्षुओं हेतु भिन्न-भिन्न स्तर की शिक्षा प्रदान की जाती जबकि बौद्ध भिक्षु ज्ञान की बृद्धि करने के लिए देशाटन पर जाते थे।

बौद्ध कालीन शिक्षा के दोष Defects of Buddhist education

बौद्धकालीन शिक्षा के प्रमुख दोष निम्न प्रकार है:- 

बौद्ध धर्म में सभी लोगों के लिए एक समान शिक्षा व्यवस्था नहीं थी। 

बौद्धकाल में शिष्य अपने गुरुओं के दोष बताते थे एवं उनके विरुद्ध संघ की प्राराम्भकोशक्षा का पृष्ठभूमि कार्यवाही प्रभावी भी कर सकते थे।

बौद्ध मठो में गुरुओं के दो स्तर थे। और उनका निर्धारण सेवाकाल की वरिष्ठता का निर्धारण-दस वर्ष या छ: वर्ष के आधार पर किया जाता था।

बौद्ध काल में विद्यार्थी सदैव के लिये गृह त्याग करते थे।

बौद्धकाल में शिक्षा समाप्ति की आयु बीस वर्ष हुआ करती थी।

बौद्धकाल में मठ एवं विहार का सम्पूर्ण नियंत्रण केन्द्रीय बौद्ध संघ करती थी। 

बौद्ध शिक्षा के धर्म पर आधारित होने के कारण इसमें केवल आध्यात्मिक विकास पर बल दिया जाता था। संसार को क्षणभंगुर मानने तथा दूसरे संसार के लिये तैयार करने के कारण बौद्ध शिक्षा ने लौकिक जीवन की उपेक्षा की।

बौद्धकाल में स्त्रियों के लिए शिक्षा तो थी किन्तु वह शिक्षा व्यवस्था धनी, सम्पन्न एवं कुलीन वर्ग की नारियों के लिए थी। सामान्य वर्ग की स्त्रियों को शिक्षा प्राप्ति के अवसर नहीं मिले। 

बौद्धकाल में बौद्ध भिक्षुणियों ने स्त्रियों एवं बालिकाओं की शिक्षा के उत्तरदायित्व का निर्वाह ठीक प्रकार से नहीं किया था। 

बौद्धकाल में भिक्षुक तथा भिक्षुणियों के परस्पर सम्पर्क होने से व्यभिचार उत्पन्न होने लगा, जो बौद्ध धर्म के पतन का प्रमुख कारण बन कर उभरा। 

बौद्ध धर्म अहिंसा में विश्वास रखता था। इसलिए बौद्धकाल में अस्त्र-शस्त्र निर्माण तथा सैनिक प्रशिक्षण नहीं दिया गया। परिणाम यह हुआ कि देश सैन्य दृष्टि से निर्बल हो गया।

बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्र Major centers of Buddhist learning

बौद्ध शिक्षा बौद्ध घर्म के ज्ञान से परिपूर्ण थी। जिसका मुख्य उद्देश्य निर्माण अर्थात मोक्ष की प्राप्ति था। उस समय बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्र नालंदा विक्रमशिला तक्षशिला, वल्लभी, नदिया ओदन्तपुरी आदि थे। जहाँ पर कई सारे शिक्षर्थी शिक्षा ग्रहण करते थे।

दोस्तों इस लेख में आपने बौद्ध कालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताओं के साथ ही बौद्ध कालीन शिक्षा के गुण और दोषों के बारे में जाना। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा। 

इसे भी पढ़े:-

  1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 की विशेषताएं
  2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की विशेषताएँ
  3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 की विशेषताएँ
  4. वैदिक कालीन शिक्षा की विशेषताएं
  5. मैकाले का विवरण पत्र
  6. वुड का घोषणा पत्र



एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ