सातवाहन वंश का इतिहास history of Satavahana dynasty

सातवाहन वंश का इतिहास

सातवाहन वंश का इतिहास history of Satavahana dynasty 

हैलो नमस्कार दोस्तों इस लेख सातवाहन वंश का इतिहास में आपका बहुत - बहुत स्वागत है। दोस्तों इस लेख में आप सातवाहन वंश का सम्पूर्ण इतिहास पड़ेंगे।

जो किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। दोस्तों यहाँ पर सातवाहन वंश के मुख्य तथ्यों को शामिल किया गया है,

जिनसे अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न पूंछे जाते है। तो आइये दोस्तों करते है शुरू यह लेख सातवाहन वंश का इतिहास:-

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सातवाहन वंश का संस्थापक कौन था who was founder of Satavahana dynasty 

सातवाहन वंश का प्रादुर्भाव कण्व वंश के पतन के पश्चात हुआ था। जिसकी स्थापना सातवाहन शासक सिमुक ने की थी।

सातवाहन राजवंश भारत का एक पुराना राजवंश है। जिस राजवंश में कई वीर राजा महाराजाओं ने जन्म लिया है।

सातवाहन राजवंश की स्थापना 60 ईसवी पूर्व में सिमुक ने दक्षिण भारत में की थी। जिनका शासन कृष्णा और गोदावरी नदियों के मध्य था।

इसलिए इन राजाओं को आंध्र भी कहा गया है। सातवाहन शासकों की राजधानी प्रतिष्ठान या पैठन हुआ करती थी। जबकि वायु पुराण में भी सातवाहन शासकों की चर्चा देखने को मिलती है।

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सातवाहन कौन थे who was satavahan 

सातवाहन कौन थे इस विषय में उनके मूल स्थान तथा अन्य स्थितियों के आधार पर विभिन्न प्रकार के मतभेद हैं। क्योंकि सातवाहन दक्षिण भारत में गोदावरी और कृष्णा नदी के मध्य राज्य करते थे।

इसलिए उन्हें आंध्र कहा जाता है। जबकि वायु पुराण के अनुसार भी सातवाहन आंध्र थे। किंतु सातवाहनों के किसी भी अभिलेख में इस बात का उल्लेख ही नहीं मिलता कि वे आंध्र थे।

और आंध्र जाति अनार्य होती है। किंतु कुछ विद्वानों ने यह स्वीकार किया है, कि सातवाहन आर्य थे। इस प्रकार से अब यह प्रमाणित हो जाता है, कि सातवाहन ब्राह्मण जाति से थे।

कुछ विद्वान जैसे आयंगर कहते हैं, कि सातवाहन अनार्य थे। क्योंकि उन्होंने कहा है, कि कई सातवाहन ऐसे राजा हैं, जिनके नाम अनार्य हैं

जैसे की सिमुक, हाल, पुलमावी और यह भी तथ्य दिया कि अनार्यो के जैसे ही सातवाहन राजाओं ने अपनी माता के नाम पर अपना नाम रखा था

जैसे कि गौतमीपुत्र,वशिष्टिपुत्र किंतु बहुत से विद्वानों ने इस तर्क का खंडन किया है। गोपालाचार्य और भांडारकर जैसे विद्वानों ने सातवाहनों ने आर्य बताया और कहा सातवाहन ब्राह्मण नहीं थे

इन विद्वानों ने बताया है, कि नासिक अभिलेख गौतमीपुत्र शातकर्णी का था उसमें उसकी तुलना राम, अर्जुन जैसे महान क्षत्रियों से बताई गई है, जो क्षत्रिय थे।

किंतु इस आधार पर भी सातवाहनों को क्षत्रिय नहीं मान सकते क्योंकि किसी की तुलना करना उसकी जाति नहीं हो सकती। कुछ विद्वान

जैसे कि बुयलर, त्रिपाठी सेनार्ट आदि ने सातवाहनों को ब्राह्मण माना गौतमीपुत्र के नासिक अभिलेख के अनुसार परशुराम के समान ब्राह्मण माना गया है।

सातवाहन शासको को अन्य अभिलेखों में क्षत्रियों का दर्प और मान चूर करने वाला भी बताया गया है। जबकि सातवाहन राजाओं के नाम

वैदिक कालीन ऋषि, ब्राह्मण, गौतम और वशिष्ठ पर भी आधारित हैं। इसलिए ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सातवाहन ब्राह्मण ही होंगे।

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सातवाहन वंश का इतिहास history of Satavahana dynasty 

हाथीगुंफा और नानाघाट अभिलेख से यह ज्ञात होता है, कि सातवाहन राजाओं ने 27 ईसवी पूर्व से अपना शासन शुरू किया था।

क्योंकि 72 से 27 ईसवी के मध्य कण्ड वंश के राजाओं ने राज्य किया था। कण्ड वंश का पतन होने के बाद सातवाहन वंश का प्रादुर्भाव हुआ।

इस प्रकार से सातवाहन वंश का पहला शासक सिमुक था जो सातवाहन वंश का संस्थापक शासक भी था। सातवाहन शासक सिमुक को पुराणों में सिंधुक और शिशुक के नाम से भी जाना जाता है। सातवाहन शासक 

सिमुक ने ही कण्ड वंश की बची हुई शक्ति को खत्म कर दिया और सातवाहन वंश की स्थापना की। सिमुक के बाद उसका छोटा भाई कृष्ण शासक बना

जिसने अपने राज्य में विस्तार किया। कृष्ण के बारे में नासिक अभिलेख से जानकारी मिलती है। कृष्ण के बाद शतकर्णी प्रथम को शासक बनाया गया।

शातकर्णी प्रथम सातवाहन वंश का सबसे शक्तिशाली प्रथम सम्राट था। शातकर्णी प्रथम कृष्ण का पुत्र माना जाता है। किंतु नानाघाट अभिलेख के द्वारा यह ज्ञात होता है, कि यह सातवाहन शासक सिमुक का पुत्र था।

शतकर्णी प्रथम के दो पुत्र थे जिनका नाम था शक्तिश्री और वेदश्री जब शातकर्णी प्रथम की मृत्यु हुई तब यह दोनों पुत्र सिंहासन के योग्य नहीं थे वे अल्पायु थे।

इस प्रकार से सातवाहन वंश का भविष्य अंधकारमय हो गया। शातकर्णी प्रथम के बारे में जानकारी सांची अभिलेख, नानाघाट अभिलेख, हाथीगुंफा अभिलेख से प्राप्त होती है।

कुछ समय तक सातवाहन वंश का धीरे-धीरे पतन शुरू हो गया। किंतु लंबे समय के पश्चात सातवाहन वंश में एक महान सम्राट फिर से पैदा हुआ जिसका नाम था

"गौतमीपुत्र शातकर्णी" गौतमीपुत्र शातकर्णी सातवाहन वंश का 23 वा शासक माना जाता है। जिसने सातवाहन वंश का फिर से पुनरुद्धार किया गौतमीपुत्र शातकर्णी एक योग, कुशल और दूरदर्शी सम्राट था

जबकि वह दयालु और उदार नीतियाँ बनाने के लिए भी प्रसिद्ध हुआ करता था। इसके शासनकाल में प्रजा बहुत ही प्रसन्न रहती थी, कियोकि इसने प्रजा के हित में कई महान कार्य किये।

गौतमीपुत्र शातकर्णी को विंध्यपति युवराज राजा जैसी उपाधियाँ प्राप्त हुई। उसकी मृत्यु 130 ई में हुई थी। गौतमीपुत्र शातकर्णी एक परमवीर योद्धा था।

इसलिए उसको क्षत्रियों का दर्द और मान को चूर करने वाला तथा परशुराम के समान पराक्रमी ब्राह्मण कहा गया है।

गौतमीपुत्र शातकर्णी ने कई राजाओं को पराजित किया और गुजरात, सौराष्ट्र, मालवा, बरार आदि कई क्षेत्रो पर अधिकार कर लिया था। नासिक अभिलेख गौतमीपुत्र शातकर्णी की विजयों का उल्लेख है।

गौतमीपुत्र शातकर्णी मृत्यु हुई तब उसका पुत्र वशिष्टिपुत्र पुलमावी शासक बना वशिष्टिपुत्र पुलमावी भी एक वीर योद्धा था।

उसने संपूर्ण आंध्रप्रदेश पर विजय प्राप्त करके सातवाहनों के अधीन कर दिया था। वशिष्टिपुत्र ने महाक्षत्रप रूद्रदामन की कन्या से शादी की थी।

किंतु रुद्रदामन ने वशिष्टिपुत्र को दो बार हराया था। जिसकी पुष्टी जूनागंड अभिलेख से होती है।

सातवाहन वंश का प्रशासन administration of Satavahana dynasty 

प्रशासनिक दशा 

सातवाहन प्रशासन राजतन्त्रात्मक प्रकार का था। राजा राज्य का सबसे बड़ा अधिकारी होता था।. तथा सैनाओं का प्रमुख भी। राजा की मृत्यु होने पर उसका पुत्र या पुत्र अल्पायु होने पर राजा का भाई राजा बनाया जाता था।

राजा को विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर परामर्श देने के लिए अमात्य नामक अधिकारी होते थे। स्थानीय शासन के अधिकारी सामंत होते थे।

महारठी’ तथा ‘महाभोज बड़े सामंत थे जिन्हे उच्च अधिकार प्राप्त होते थे। सातवाहन साम्राज्य कई विभागों जिन्हे आहार कहते थे में बंटा था।

एक आहार एक केंद्रीय नगर तथा कई गांवों से मिलकर बनता था। जिसके मुखिया को आमात्य कहा जाता था। जबकि गाँव के मुखिया को ग्रामिक कहते थे।

शासन को चलाने के लिए भाण्डागारिक (कोषाध्यक्ष), रज्जुक (राजस्व विभाग प्रमुख का प्रमुख), पनियघरक (नगरों में जलपूर्ति का प्रबन्ध करने वाला मुख्य अधिकारी),

कर्मान्तिक (भवनों के निर्माण की देख-रेख करने वाला मुख्य अधिकारी), सेनापति आदि की नियुक्ति होती थी। 

सांस्कृतिक और धार्मिक सामाजिक दशा

सातवाहन साम्राज्य में वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी। समाज ब्रह्मण, क्षत्रिय वैश्व, शूद्र में विभक्त था। व्यवसाय के आधार पर अन्य

छोटी मोटी जातियाँ भी उपस्थित थी। बौद्ध धर्म की उत्पत्ति का समय तथा कर्मकांड की प्रधानता थी। कई यज्ञ अश्वमेघ, राजसूय का चलन था।

इंद्र सूर्य चंद्र वासुदेव आदि पूजे जाने वाले देवता थे। स्तूप, बोधिवृक्ष, बुद्ध के चरणचिह्नों, प्रसिद्ध स्थान के साथ ही त्रिशूल, धर्मचक्र, बुद्ध तथा अन्य महात्माओं के अवशेष भी पूजयनीय थे।

सातवाहन काल में आर्थिक पक्ष भी अधिक मजबूत था। किसान भूमि के स्वामी होते थे। तथा कृषि उन्नत तरीके से की जाती थी। सातवाहन प्रशासन में लगभग 70 व्यवसायों का उल्लेख मिलता है।

कुम्भकार, लोहार, चर्मकार, यांत्रिक स्वर्णकार धनिक आदि कई व्यवसायी सातवाहन साम्राज्य में थे। 

सातवाहन वंश का अंतिम शासक satvahan Vansh ka antim shasak 

सातवाहन वंश का परम प्रतापी और शूरवीर अंतिम शासक यज्ञश्री शातकर्णी था। जिसने शकों पर विजय प्राप्त की थी। तथा संपूर्ण आंध्र प्रदेश पर अपना अधिकार जमा लिया था।

किंतु यज्ञश्री शातकर्णी के बाद होने वाले सातवाहन शासक निर्बल और अयोग्य साबित हुए। जिनके बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं है।

सातवाहन वंश के अंतिम शासको की दुर्बलता और आयोग्यता का फायदा उठाते हुए पल्लव वंश तथा इक्षवाकु वंश ने दक्षिण भारत पर अधिकार करना शुरू कर दिया तथा सातवाहन वंश सदा के लिए नष्ट हो गया। 

सातवाहन वंश का पतन Satavahana vansh ka Patan 

सातवाहन वंश के पतन का मुख्य कारण अयोग्य और निर्बल शासक था। सातवाहन वंश का अंतिम शूरवीर शासक यज्ञश्री शातकर्णी था। जिसने लगभग 35 साल तक शासन किया था।

जिसने लगातार साम्राज्य का विस्तार किया और कई राजाओं पर विजय प्राप्त की। यज्ञश्री शातकर्णी ने शकों पर पर विजय प्राप्त की।

उसकी मुद्राएँ गुजरात,काठियावाड़, मध्य प्रदेश कई स्थानों से प्राप्त हुई है। यज्ञश्री शातकर्णी ने अपना साम्राज्य मुख्यत: महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में फैलाया था। यज्ञश्री शातकर्णी मोहरों पर

जहाज और  शंख की आकृति दिखाई देती है। किंतु यज्ञश्री शातकर्णी के बाद अन्य सातवाहन शासक निर्बल और अयोग्य थे।

इनके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। इसलिए सातवाहन वंश धीरे-धीरे शासकों की दुर्बलता और अयोग्यता के कारण पतन की और बढ़ता गया तथा पल्लव वंश के राजाओं ने अपना अधिकार जमाना शुरू कर दिया।

सातवाहन वंश के मुख्य बिंदु Important points of Satavahana dynasty 

सातवाहन वंश के शासकों ने आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक के मुख्यत: सभी क्षेत्रों पर शासन किया था।

सातवाहन वंश की राजधानी प्रतिष्ठान / पैठन जब की राजकीय भाषा प्राकृत तथा लिपि ब्राह्मी थी।

गौतमीपुत्र शातकर्णी ने पार्थियनो तथा शकों को पराजित कर खोई हुई प्रतिष्ठा फिरसे प्राप्त की थी।

शातकर्णी शासक ने सबसे पहले राजसूय और अश्वमेघ यज्ञ करवाया था, तथा उसे दक्षिणापति की उपाधि प्राप्त थी।

वाशिष्टिपुत्र ने अमरावती के बौद्ध स्तूप का पुनरुधार करवाया था। 

सातवाहन शासक सवाल एक बहुत बड़ा कवि था जिसने प्राकृत भाषा में गाथा सप्तशती की रचना की।

भडोच बंदरगाह सातवाहन शासकों का प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह था।

दोस्तों आपने इस लेख में सातवाहन वंश का इतिहास के साथ सातवाहन वंश के कई महत्वपूर्ण तत्वों के बारे में जानकारी प्राप्त की आशा करता हूँ, यह लेख आपको अच्छा लगा होगा।

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