वैदिक कालीन शिक्षा की विशेषताएँ Features of vedic period education

वैदिक कालीन शिक्षा की विशेषताएँ


वैदिक कालीन शिक्षा की विशेषताएँ Features of vedic period education

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है आज के हमारे इस लेख वैदिक कालीन शिक्षा की विशेषताओं (Features of vaidic period education) में।

दोस्तों आज हम इस लेख के माध्यम से वैदिक कालीन शिक्षा क्या है? वैदिक कालीन शिक्षा की विशेषताएँ और वैदिक कालीन शिक्षा के दोषों के बारे में पड़ेंगे।

तो आइए दोस्तों शुरू करते हैं, आज यह लेख और पढ़ते है, वैदिक कालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ क्या है?:- 

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वैदिक कालीन शिक्षा क्या है what is vedic education

वैदिक कालीन में छात्र- छात्राओं को दी जाने वाली शिक्षा ही वैदिककालीन शिक्षा कहलाती है, जो गुरुकुल में तथा गुरु के आश्रम में उनके समीप रहकर छात्रों को प्रदान की जाती थी..

जिसका माध्यम अन्य कोई भाषा ना होकर केवल संस्कृत भाषा हुआ करता था। वैदिककालीन शिक्षा में वेदों का ज्ञान प्रमुख रूप से दिया जाता था।

वैदिककालीन शिक्षा को छात्रों के जीवन में वह प्रकाश का स्रोत माना जाता था, जिसके द्वारा ही व्यक्ति अपना सर्वागीण विकास करना असंभव कर पाता था।

वैदिक कालीन शिक्षा का मुख्य लक्ष्य होता था " चरित्र निर्माण" व्यक्तित्व विकास, सभ्यता और संस्कृति का प्रसार अतः कह सकते है

कि वैदिक कालीन शिक्षा वह शिक्षा थी जिसमें वेदों में सुरक्षित ज्ञान छात्रों को प्रदान किया जाता था, जिससे उसका सर्वागीण विकास संभव हो सके।

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वैदिक कालीन शिक्षा के (गुण) विशेषताएँ Features of Vedic Education

वैदिक कालीन शिक्षा के (गुण) विशेषताएँ निम्न प्रकार से है:- 

उपनयन संस्कार Upnayan Sanskar 

वैदिक काल में दी जाने वाली शिक्षा दो चरणों में दी जाती थी। प्राथमिक शिक्षा (Primary education) और गुरुकुल की शिक्षा। प्राथमिक शिक्षा वह शिक्षा थी जो घर में परिवारजनों के द्वारा बच्चों को प्रदान की जाती थी।

इस शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थी भाषा, छंद शास्त्र और गणित के प्रारंभिक ज्ञान का अर्जन करते थे। जब बालक 8 से 9 वर्ष का हो जाता था।

तो उसकी प्रारंभिक शिक्षा समाप्त हो जाती थी और उसे अब गुरुकुल में प्रवेश करना पड़ता था। बालक के गुरुकुल में प्रवेश करने पर एक संस्कार होता था उसे उपनयन संस्कार कहते थे।

उपनयन संस्कार बालक के गुरुकुल में प्रवेश के समय हुआ करता था, जिसमें बालक के सभी रिश्तेदार उपस्थित होते थे। उपनयन का अर्थ ही होता है

"गुरु के समीप जाना" बालक गुरु जी से प्रार्थना करता था, कि मैं आपके साथ ब्रम्हचर्य जीवन व्यतीत करने आया हूँ, मुझे ब्रह्मचारी बनने दो तब गुरुजी पूछते थे

तुम किसके ब्रह्मचारी हो तो छात्र उत्तर देता था मैं आपका ब्रह्मचारी हूँ। इस प्रकार से बालक का उपनयन संस्कार पूर्ण होता था

और अभिभावक अपने बच्चे को गुरु को समर्पित कर देते थे। उपनयन संस्कार से पहले बालक को शूद्र कहा जाता था और उपनयन संस्कार के बाद उसको द्विज कहा जाता था।

उपनयन संस्कार के बाद छात्र 12 वर्ष तक शिक्षा ग्रहण करता था और लगभग 24 से 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्माचार्य का जीवन जीता था और फिर गृहस्थाश्रम में प्रवेश के योग हो जाता था।

पाठ्यक्रम Syllabus 

वैदिक काल में पाठ्यक्रम भी रोचक और नीरस हुआ करता था। वैदिक काल में आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के विषयों का अध्ययन कराना आवश्यक समझा जाता था।

किंतु वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था का विभाजन हो गया था, इसलिए वर्ण व्यवस्था के अनुसार भी कुछ पाठ्यक्रम निर्धारित कर दिए गए थे।

भौतिक विषय के अंतर्गत इतिहास, औषधीशास्त्र अर्थशास्त्र, भौतिक शास्त्र, प्राणी शास्त्र, रसायन शास्त्र ज्योतिष शास्त्र के साथ ही धनुर्विद्या शिल्पविद्या आदि का भी अध्ययन कराया जाता था।

अध्यात्मिक विषय के अंतर्गत वेद, वेदांग, उपनिषद पुराण दर्शन, नीति शास्त्र आदि का अध्ययन करना अनिवार्य होता था।

किंतु जो ब्राह्मण छात्र होते थे उनके लिए धार्मिक ग्रंथों (Religious texts) का पठन-पाठन और क्षत्रिय छात्रों के लिए शस्त्र विद्या (Weaponry) और राजनीति (Politics) का अध्ययन आवश्यक माना ही जाता था।

शिक्षण विधि Teaching Methods

वैदिक काल में शिक्षण विधि मौखिक विधि का प्रयोग किया जाता था। मौखिक विधि के द्वारा ही गुरु जी बड़े ही मनोरंजक ढंग से शिक्षा प्रदान करते थे।

उसके बाद आत्म चिंतन मनन के लिए भी कहा जाता था। गुरुकुल में अक्सर कई प्रकार की प्रतियोगिताएँ जैसे- प्रश्न उत्तर, वाद विवाद शास्त्रार्थ विधि का प्रयोग किया जाता था।

चिंतन मनन,ध्यान आदि के द्वारा व्यक्तित्व के गुणों का विकास आवश्यक होता था। यहाँ पर मॉनिटरियल व्यवस्था भी प्रचलित थी।

जो उच्च कक्षा के विद्यार्थी होते थे, वह निम्न कक्षाओं के छात्रों को पढ़ाने का कार्य किया करते थे। इस काल में सरल से कठिन की ओर ज्ञात से अज्ञात की ओर का आगमन से निगमन की ओर विधियों का अधिक प्रयोग किया जाता था।

गुरु शिष्य संबंध Teacher Student Relation

वैदिक काल में गुरु-शिष्य संबंध बड़े ही मधुर विश्वास और प्रेम की डोर से बंधे हुए होते थे। शिष्य गुरु की सेवा करता था ओर अपने माता - पिता की तरह पूजते थे।

जबकि गुरु भी अपने शिष्य के प्रति वात्सल्य का भाव प्रकट करते थे। गुरु को भगवान (God) की तरह माना जाता था और गुरु भी अपने शिष्य को भक्तों और पुत्र की तरह ही मानते थे। और अपना संपूर्ण ज्ञान शिष्यों के लिए अर्पित कर देते थे।

अनुशासन Discipline

वैदिक काल में अनुशासन का भी बड़ा महत्व था। सभी विद्यार्थी अनुशासन में रहते थे। विद्यार्थियों को पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता था।

खान-पान वेशभूषा, रहन सहन आदि सभी नियमों का जागरूकता से पालन करते थे। गुरुकुल के सभी छात्रों की जीवन शैली एक जैसे हुआ करती थी।

शिक्षा भवन School Building 

छात्र देवालयों गुरुकुलो और आश्रमों में रहकर शिक्षा ज्ञान का अर्जन किया करते थे। किंतु अधिकतर शिक्षा देने के कार्य शीतल छाया देने वाले

वृक्षों के नीचे ही किया जाता था और जब वर्षा होती थी तो गुरु ग्रह, गुरुकुल या भवन आदि में शिक्षा देने का कार्य हुआ करता था।

समावर्तन समारोह Samapvartan Samaroh 

जब विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर लेता था और वह 24 से 26 साल का हो जाता था। तब वह ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के योग्य हो जाता था।

विद्यार्थी का शिक्षण कार्य पूरा होने के पश्चात उसको स्नातक कहा जाता था। तथा उसका शिक्षा समाप्ति पर एक विशेष प्रकार का समारोह आयोजित किया जाता था, जिसे समापवर्तन समारोह कहा जाता था।

इसमें गुरु छात्र को विशेष प्रकार के उपदेश दिया करता था। जो उसे भावी जीवन में सफल और एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए जीवनभर प्रेरणास्रोत तथा पथ प्रदर्शक होता था।

सभी व्यक्तियों के लिए शिक्षा Education for all

वैदिक काल में सभी व्यक्तियों के लिए शिक्षा के अवसर थे,चाहे वह किसी भी वर्ग के अंतर्गत ही क्यों ना आता हो यहाँ पर जाति वर्ग आदि के द्वारा किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था शिक्षा निशुल्क प्रदान की जाती थी।

स्त्री शिक्षा Woman Education

वैदिक काल में नारियों के लिए भी शिक्षा के द्वार खुले हुए थे। उनके लिए शिक्षा के पर्याप्त अवसर थे। समाज में नारी भी पुरुषों के समान शिक्षा ग्रहण करती थी।

स्त्रियों को अर्धांगिनी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि वह पुरुष के लिए शांति, सुख, संतोष और ज्ञान प्राप्त का अच्छा स्रोत होती है।

वैदिक कालीन शिक्षा के दोष Defects of vedic period education

वैदिक कालीन शिक्षा एक प्रकार से देखी जाए तो विभिन्न प्रकार के गुणों से परिपूर्ण थी, किंतु दूसरी ओर से देखी जाए तो इसमें विभिन्न प्रकार के दोष भी उत्पन्न हो गए थे वैदिक कालीन शिक्षा के प्रमुख दोष निम्न प्रकार से हैं:-

  1. वैदिक काल में शिक्षा की व्यवस्था करना राज्य का उत्तरदायित्व नहीं होता था। यह व्यक्तियों के नियंत्रण में रहा करती थी। इस प्रकार से शिक्षा का कोई सर्वमान्य स्वरूप उस समय प्रचलित नहीं था। 
  2. वैदिक कालीन की शिक्षा पूरी तरह से धर्म से प्रभावित थी। जिसमें विकास की ओर बहुत ही कम महत्व दिया गया था। धर्म प्रधान शिक्षा होने से छात्रों में धर्म के प्रति अराजकता भी बढ़ती थी। और उनके विवेक का विकास भी नहीं हो पाता था।
  3. वैदिक काल में शूद्रों को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं था जो कि अन्याय पूर्ण था। 
  4. वैदिक काल में जो शिक्षा दी जाती थी। उस शिक्षा में दर्शन के अध्ययन पर अधिक महत्व दिया जाता था। दर्शन पर बल अधिक दिया जाता था जिसके कारण जीवन में पलायन की भावना अधिक विकसित हो जाती थी।
  5. वैदिक कालीन शिक्षा में नारियों को शिक्षा के अवसर प्राप्त तो होते थे किंतु नारियाँ गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण नहीं करती पाती थी।
  6. वैदिक कालीन शिक्षा की भाषा संस्कृत भाषा हुआ करती थी। अतः वैदिक काल में अन्य भाषाओं में शिक्षण का कार्य नहीं हो पाता था। जो एक प्रमुख दोष था। जिसके कारण बहुत से छात्र शिक्षा अर्जित नहीं कर पाए।
  7. वैदिक कालीन शिक्षा प्रणाली में मुद्रण कला का विकास नहीं हुआ था। इसलिए गुरु के द्वारा दिए जाने वाले संपूर्ण ज्ञान को छात्र को स्मरण करने के लिए कहा जाता था।
  8. वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी। जिसके कारण हस्तकला करने वाले व्यक्तियों को हीन भाव से देखा जाता था। इसलिए हस्तकला का शिक्षा में अभाव हो गया।

इसके अलावा भी वैदिक कालीन शिक्षा में विभिन्न प्रकार के दोष पाए गए जिसके कारण एक बड़ा वर्ग शिक्षा ग्रहण करने से वंचित रह गए।

दोस्तों इस लेख में आपने वैदिक कालीन शिक्षा की विशेषताएँ (Features of vaidic period education) पड़ी, आशा करता हुँ आपको यह लेख आपको अच्छा लगा होगा।

इसे भी पढ़े:-

  1. वुड का धोषणा पत्र
  2. मैकाले का विवरण पत्र
  3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986





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