जैन धर्म क्या है, नियम और सिद्धांत what is jainism principle and rules

जैन धर्म क्या है, नियम और सिद्धांत

जैन धर्म क्या है, नियम और सिद्धांत what is jainism principle and rules

हैलो दोस्तों आपका बहुत बहुत स्वागत है इस लेख जैन धर्म क्या है, नियम और सिद्धांत (What is Jainism principle and rules) में। दोस्तों इस लेख के माध्यम से आप जैन धर्म से सम्बंधित सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को जान पायेंगे।

यह लेख प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण सिद्ध होगा. तो आइये दोस्तों पड़ते है यह लेख जैन धर्म क्या है, नियम और सिद्धांत:-

जैन धर्म क्या है what is jain dharm 

जैन धर्म की उत्पत्ति श्रमण परंपरा से मानी जाती है। जिसके प्रवर्तक 24 वे तीर्थंकर महावीर स्वामी तथा संस्थापक पहले तीर्थकर ऋषभदेव है।

जैन शब्द की उत्पत्ति जिन शब्द से हुई है, और जिन शब्द संस्कृत के जि शब्द से उत्पन्न हुआ जिसका अर्थ होता है "जीतना" अर्थात अपनी तन, मन, वाणी तथा

इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला जितेंद्रिय (Jitendriya) कहलाने लगा। तथा जिन का अनुसरण करने वालों को जैन कहा जाने लगा।

जैन धर्म में दिए गए सिद्धांत तथा शिक्षाओं पर जैन धर्म के अनुयायी चलते हैं। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे।

पार्श्वनाथ काशी के महान सम्राट अश्वसेन के पुत्र थे। चार आर्य सत्य या चार महाव्रत अहिंसा अस्तेय अपरिग्रह तथा सत्य को पार्श्वनाथ ने जोड़ा था।

जबकि पांचवां पंच महाव्रत "ब्रह्मचर्य" भगवान महावीर के द्वारा जोड़ा गया। जैन धर्म भारत का एक प्राचीन धर्म है जिसे कई महान राजाओं ने संरक्षण प्रदान किया था।

वैदिक काल का इतिहास

जैन धर्म के संस्थापक founder of jainism 

जैन धर्म भारत का एक बहुत प्राचीन धर्म है, जैन धर्म को भारत के कई महान सम्राटों ने अपनाया था। जैन ग्रंथों के अनुसार बताया जाता है

कि जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी को माना जाता है। महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। जबकि जैन धर्म के संस्थापक (founder of Jainism) ऋषभदेव है

जो पहले एक राजा था। महावीर स्वामी ने छठवीं शताब्दी में जैन धर्म का प्रचार और प्रसार किया। तथा जैन धर्म को उच्च शिखर तक पहुंचाने का श्रेय भी महावीर स्वामी को ही है।

आगे चलकर जैन धर्म दो संप्रदायों (Sects) में बंट गया। एक संप्रदाय का नाम था श्वेतांबर (Shvetambara) जो श्वेत वस्त्र धारण करते थे और दूसरा संप्रदाय था दिगंबर (Digambara) जो निर्वस्त्र रहा करते थे।

शुंग वंश का सामान्य ज्ञान

जैन धर्म के प्रवर्तक कौन थे who was the originator of Jainism

जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर स्वामी है, जो जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं। महावीर स्वामी का जन्म 540 ईसवी पूर्व में वैशाली के निकट एक गांव कुंडग्राम (Kundgram )में हुआ था।

इनके बचपन का नाम था वर्धमान। वर्धमान के पिताजी का नाम सिद्धार्थ था, तथा माता का नाम त्रिशला देवी था। महावीर स्वामी के पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक वंश के राजा थे।

जबकि इनकी माताजी त्रिशला देवी लिच्छवी शासक चेटक की बहन थी। महावीर स्वामी का विवाह यशोदा नामक एक सुंदर कन्या से हुआ था।

उनसे उनको एक सुंदर पुत्री उत्पन्न हुई जिसका नाम था प्रियदर्शना प्रियदर्शना को अणोज्जा के नाम से भी जाना जाता था। महावीर स्वामी का जन्म से ही सांसारिक भोग विलास में मन नहीं लगता था।

इसलिए 30 वर्ष की अवस्था में तपस्वी होकर घर त्याग वन में चले गए और सन्यासी हो गए। उन्होंने 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की

और अंत में उन्हें ऋजुपालिका नदी (Rijupalika River) के तट पर जरम्भिक नामक स्थान पर कैवल्य सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त हुआ। तथा निर्वस्त्र रहने के कारण वे जिन कहलाए।

महावीर स्वामी ने जैन धर्म का प्रचार प्रसार किया महावीर स्वामी ने अपना पहला उपदेश राजगृह में दिया था। जैन धर्म को मानने वाले प्रमुख राजा

उदायिन,चंद्रगुप्त मौर्य, कलिंग राजा खारवेल, गुजरात के सोलंकी शासक,गंग नरेश आदि प्रमुख थे। महावीर स्वामी की मृत्यु 72 वर्ष की आयु में

468 किसी पूर्व में पावापुरी (Pavapuri) नामक के स्थान पर राजा हस्थिपाल के महल में हुई थी।

जैन धर्म के तीर्थकर Tirthankaras of Jainism

जैन धर्म में 24 तीर्थकर हुए जिनमें से जैन धर्म के सबसे पहले तीर्थकर थे ऋषभदेव इनको ही जैन धर्म का संस्थापक माना जाता है।

ऋग्वेद नामक वेद में भी ऋषभदेव के नाम का उल्लेख मिलता है। जैन धर्म के 24 तीर्थंकर निम्न प्रकार से हैं

1. ऋषभदेव
2. अजीतनाथ
3. संभवनाथ
4. अभिनंदन
5. सुमतिनाथ
6. पदमप्रभु
7. सुपाशर्वनाथ
8. चंद्रप्रभु
9. सुविधिनाथ
10. शीतलनाथ
11. श्रेयासनाथ
12. वासुनाथ 
13. विमलनाथ
14. अनंतनाथ
15. धर्मनाथ
16. शांतिनाथ
17. कुंथूनाथ
18. अर्रनाथ
19. मल्लीनाथ
20. मुनिसुब्रत
21. नेमिनाथ
22. अरिष्ठनेमी
23. पाषर्वनाथ 
24. महावीर स्वामी

जैन धर्म के सिद्धांत नियम और शिक्षाएँ Principles, Rules and Teachings of Jainism

जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत निम्न प्रकार से हैं:-

ईश्वर में अविश्वास - जैन धर्म तथा उनके अनुयायी ईश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं। जैन धर्म यह नहीं मानता है, कि इस संसार की सृष्टि, निर्माता और पालनकर्ता ईश्वर है। जैन धर्म में कहा गया है,

कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता है ही नहीं। जीव जंतुओं को सुख दुख उनके कर्मों के अनुसार प्राप्त होता है। अतः जैन धर्म ईश्वर में पूर्णता अविश्वास रखता है और ईश्वर का खंडन करता है।

वेदों में अविश्वास - जैन धर्म और जैन धर्म के अनुयायी वेदों में अविश्वास रखते हैं। वेदों में कही गई बातें जैन धर्म के अनुयायी और जैन धर्म के तीर्थकरों के अनुसार मिथ्या हैं,

जो कुछ वेदों में ईश्वर और सृष्टि के बारे में कहा गया है जैन धर्म उन पर विश्वास नहीं करता है जैन धर्म के अनुयायी केवल महावीर स्वामी के सिद्धांतों पर विश्वास करते हैं और उनकी बातों को मानते हैं।

त्रिरत्नों के द्वारा मोक्ष प्राप्ति - जैन धर्म में तीन प्रकार के त्रिरत्न दिए गए हैं, जिन्हें मोक्ष प्राप्ति का साधन माना जाता है। वह त्रिरत्न हैं, सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र

पंच महाव्रत - जैन धर्म में पांच महाव्रत दिए गए हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्ति का साधन भी माना जाता है। जैन धर्म के पांच महाव्रत निम्न प्रकार से है:- 

अहिंसा - अहिंसा का अर्थ प्रत्येक जीव के प्रति दया और करुणा का भाव रखना होता है।

सत्य - सत्य बोलना ही शाश्वत धर्म है, मनुष्य को हर एक परिस्थिति में सत्य बोलना चाहिए मनुष्य को माया, क्रोध आदि के वशीभूत होकर मिथ्या कभी नहीं बोलना चाहिए।

अस्तेय - अस्तेय का अर्थ होता है चोरी ना करना और चोरी की योजनाओं को ना बनाना अर्थात मनुष्य को चोरी नहीं करनी चाहिए और ना ही किसी के साथ चोरी की योजनाओं को बनाना चाहिए।

अपरिग्रह - अपरिग्रह का मतलब होता है सांसारिक भोग विलास की वस्तुओं का संग्रह ना करना जितनी आवश्यकता होता है, उतनी वस्तुओं का उपयोग में लाया जाना

मनुष्य को अपनी आवश्यकता के अनुसार ही वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए तथा आवश्यकता के अनुसार किसी भी सांसारिक भोग विलास की वस्तुओं का अधिक संग्रह करना पाप होता है।

ब्रह्मचर्य - ब्रम्हचर्य महावीर स्वामी के द्वारा जोड़ा गया पाँचवा महाव्रत है इसका अर्थ होता है इंद्रियों को वश में करना अर्थात किसी प्रकार की कामवासना मन में उत्पन्न ना होने देना।

कर्म की प्रधानता में विश्वास - जैन धर्म कर्म की प्रधानता में विश्वास करता है, जैन धर्म के अनुयायी और जैन धर्म के प्रवर्तक मानते हैं, कि यह जीवन कर्म के अनुसार ही प्राप्त होता है।

व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। कर्म के फलों के द्वारा ही व्यक्ति को सुख और दुख दोनों का सामना भी करना पड़ता है। जैन धर्म के अनुसार मन बल बचन बल और कार्य बल इन तीनों से कर्म बल का निर्माण होता है।

पुनर्जन्म से मुक्ति - जैन धर्म के अनुसार बताया गया है, कि मनुष्य पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार ही बार बार जन्म लेता मरता है।

जब तक उसके कर्मों का हिसाब बराबर नहीं हो जाता तब तक उसे पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है। मनुष्य तभी पुनर्जन्म से मुक्ति पा सकता है जब तक उसे कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती।

आत्मा की सत्ता में विश्वास - जैन धर्म मानता है, कि प्रत्येक प्राणी में एक अजर अमर आत्मा पाई जाती है। और जब जीव की मृत्यु हो जाती है

तो वह आत्मा अन्य शरीर धारण करती है। महावीर स्वामी सभी प्राणियों में आत्मा का अस्तित्व स्वीकार करते हैं।

अनेकांतवाद - संसार में विभिन्न धर्म है, और सभी धर्म के अनुयायी अपने अपने धर्म को तथा धर्म के सिद्धांत को सत्य सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं

और यह संघर्ष लगातार चलता रहता है। इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए जैन धर्म ने अनेकांतवाद का प्रतिपादन किया।

स्यादवाद - यह जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है, जिसका अर्थ है, कि जो भी बात कही जाती है, वह किसी विशेष अपेक्षा के अनुसार ही कहीं जाती हैं जिसमें सत्य और असत्य व्यक्ति की अपेक्षाओं के अनुसार गुप्त रूप में रहता है। 

जैन धर्म के संप्रदाय या संघ sects or associations of Jainism

एक बार मगध में भयंकर अकाल पड़। उस समय चंद्रगुप्त मौर्य (Chandragupt Mourya) शासन कर रहे थे। तथा उसी समय जैन धर्म के प्रमुख के रूप में भद्रबाहु और स्थूलभद्र जैन धर्म की शिक्षा और प्रचार प्रसार का कार्य करते थे।

जब मगध में भयंकर अकाल (Draught) पड़ा तब जैन धर्म के प्रमुख भद्रबाहु अपने कुछ अनुयायियों को लेकर मैसूर चले गए तथा मैसूर में उन्होंने जैन धर्म का प्रचार प्रसार किया।

तथा अपने अनुयायियों को निर्वस्त्र रहने की शिक्षा प्रदान की जबकि स्थूलभद्र मगध में ही रहे और उन्होंने अपने अनुयायियों को श्वेत वस्त्र धारण करने की दीक्षा दी।

किंतु यह विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब भद्रबाहु मैसूर से लौटकर पुनः मगध आए और भद्रबाहु तथा स्थूलभद्र के मध्य जैन धर्म के नियम, सिद्धांत तथा शिक्षाओं को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया

और जैन संघ दो हिस्सों में बंट गया। जिनमें से एक हिस्से का नाम हुआ दिगंबर तथा दूसरे हिस्से का नाम हुआ स्वेतांबर। दिगंबर निर्वस्त्र रहा करते थे तथा इनके प्रमुख भद्रबाहु थे।

वही श्वेतांबर श्वेत वस्त्र धारण करते थे जिनके प्रमुख स्थूलभद्र थे। वही जैन संघ के सदस्य 4 वर्गों में विभाजित थे। भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक, श्राविका जिनमें भिक्षु भिक्षुणी सन्यासी का जीवन जिया करते थे

और वही श्रावक तथा श्राविका गृहस्थ जीवन जीने के लिए उत्तरदाई हुआ करते थे। महावीर स्वामी ने अपने सभी अनुयायियों को 11 गणों में बांट दिया था. प्रत्येक गण का एक प्रमुख होता था जिसका कार्य धर्म प्रचार करना तथा शिक्षाएँ देना होता था। 

जैन संगीति jain sangeeti 

जैन संगीतियाँ दो हुई है, जिनमें पहली जैन संगीति 322 से 298 ईसवी पूर्व में पाटलिपुत्र (Patna) में हुई थी। जिसकी अध्यक्षता स्थूलभद्र ने की थी,

जो श्वेतांबर संप्रदाय के समर्थक थे। वहीं द्वितीय जैन संगीत 512 इस्वी पूर्व में वल्लभी (Vallabhi) नामक स्थान पर हुई थी, इस संगीति की अध्यक्षता देवर्धि क्षमाश्रवण ने की थी। 

जैन धर्म ग्रंथ Jain scriptures

सभी जैन धर्म ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा (Prakrit language) में हुई है। जबकि जैन ग्रंथों को आगम के नाम से जाना जाता है जिनमें 12 अंग 12 उपांग 10 प्रकीर्ण 6 छेदसूत्र और चार मूल सूत्र उपस्थित थे।

प्रथम जैन संगीति में इन आगमो का संकलन किया गया था। और द्वितीय जैन संगीति में इनका पुनः संकलन किया गया पहले आगमो की संख्या 12 थी।

किंतु एक अंग खो जाने से इनकी संख्या 11 बची है। जैन ग्रंथ परिशिष्ट पर्व, आचारांगसूत्र, कल्पसूत्र, भगवती सूत्र, भद्रबाहु चरित्र आदि महत्वपूर्ण जैन करते हैं।

जैन तीर्थकरो का जीवन वृतांत भद्रबाहु द्वारा लिखे हुए कल्पसूत्र नामक ग्रंथ में है। जबकि आचारांगसूत्र और कल्पसूत्र ग्रंथ से महावीर स्वामी की कठोर तपस्या का वर्णन भी मिलता है।

जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में महावीर स्वामी के जीवन में होने वाली समस्त घटनाओं का वर्णन है। जबकि कल्पसूत्र, भगवती सूत्र भद्रबाहु चरित्र आदि से कई ऐतिहासिक सामग्रियों की जानकारी प्राप्त होती है। 

जैन धर्म प्रश्नोत्तरी Jainism quize

Q. 1. जैन धर्म के संस्थापक हैं
A. महावीर स्वामी
B. अरिष्ठनेमी
C. ऋषभदेव
D. इनमें से कोई नहीं
उत्तर. C. ऋषभदेव
Q. 2 जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी को कैवल्य सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
A. 10 वर्ष बाद
B. 15 वर्ष बाद
C. 13 वर्ष बाद
D. 12 वर्ष बाद
उत्तर. D. 12 वर्ष बाद
Q. 3. जैन धर्म ग्रंथ किस भाषा में लिखे गए हैं
A. प्राकृत भाषा में
B. पाली भाषा में
C. संस्कृत भाषा में
D. इनमें से कोई नहीं
उत्तर. A. प्राकृत भाषा में
Q. 4. महावीर स्वामी की पुत्री का क्या नाम था
A. यशोदा
B. भानुमति
C. प्रियदर्शना
D. इनमें से कोई नहीं
उत्तर. C. प्रियदर्शना
Q. 5. महावीर स्वामी के दामाद का नाम क्या था
A. हर्षवर्धन
B. जमाली
C. देवदत्त
D. इनमें से कोई नहीं
उत्तर B. जमाली 

दोस्तों इस लेख में आपने जैन धर्म क्या है जैन धर्म के प्रवर्तक व संस्थापक कौन है के साथ जैन धर्म के सिद्धांतों व शिक्षाएं संघ तथा संगीतियों के बारे में पढ़ा आशा करता हूँ, यह लेख आपको अच्छा लगा होगा। 

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