संघ मोलस्का का वर्णन तथा लक्षण Description and symtoms of the phylum Mollusca

संघ मोलस्का का वर्णन तथा लक्षण

संघ मोलस्का का वर्णन तथा लक्षण Description and symtoms of the phylum Mollusca

हैलो दोस्तों नमस्कार आपका आज के इस लेख संघ मोलस्का का वर्णन तथा लक्षण में बहुत बहुत स्वागत है। दोस्तों इस लेख के माध्यम से आप

संघ मोलस्का का वर्णन कीजिये, मोलस्क अर्थ, और संघ मोलस्का के सामान्य लक्षण के साथ संघ मोलस्का का वर्गीकरण भी जान पायेंगे।

तो आइये दोस्तों करते है शुरू आज का यह लेख संघ मोलस्का का वर्णन तथा लक्षण:-

संघ अर्थ्रोपोडा के लक्षण

मोलस्का क्या है? मोलस्क अर्थ what is Mollusca meaning of Mollusca

मोलस्का अकशेरुकी जीवो का एक संघ है, जिनमें कोमल शरीर वाले सभी जीव जंतुओं को शामिल किया गया है।

मोलस्क का अर्थ होता है "कोमल" अर्थात कोमल शरीर वाले जंतु मोलस्क कहलाते हैं। साधारण शब्दों में कह सकते हैं, कि वे अकशेरुकी जंतु

जिनका शरीर कोमल अखंडित होता है। जिनकी देहभित्ति के वलन से बना हुआ एक लिफाफे के जैसा आवरण मेंटल होता है,

और इस मेंटल से अधिकांश जंतुओं में कैल्शियम से युक्त एक कवच का निर्माण होता है, जो बाहरी आघातों तो उसे इन प्राणियों की रक्षा करने में मदद करता है,

वे जंतु संघ मोलस्का के अंतर्गत आते हैं। संघ मोलस्का में वर्तमान में 85000  ज्ञात प्रजातियाँ सम्मिलित हैं।

नामकरण Nomenclature

संघ मोलस्का के विभिन्न प्राणियों का अध्ययन सबसे पहले अरस्तु नामक वैज्ञानिक ने किया था। किन्तु इस संघ नामकरण 1650 में जोन्सटन ने किया था।

संघ मोलस्का के मुख्य लक्षण Main Characteristics of phylum Mollusca

संघ मोलस्का संघ आर्थोपोडा के बाद दूसरा बड़ा संघ हैं संघ मोलस्का की विशेषताएं निम्न प्रकार से हैं:-

आवास एवं प्रकृति - संघ मोलस्का के जंतु सभी स्थानों पर पाए जाते हैं। इस संघ के जंतु स्वच्छ जलीय, समुद्री जलीय, कुछ जंतु स्थलीय

तो कुछ जंतु उभयचर स्वभाव की भी होते हैं। संघ मोलस्का के जंतु शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रवृत्ति के होते हैं।

शारीरिक संगठन और जनन स्तर - संघ मोलस्का के जंतुओं का शरीर अंग स्तर का होता है। जबकि यह त्रिजनन स्तरीय जंतु होते है।

सममिति - संघ मोलस्का के अधिकतर जंतु द्वीपाशर्व जंतु होते हैं, अर्थात जिनका शरीर दो बराबर भागों में विभक्त हो सकता है। जबकि इस संघ के कुछ वर्ग के जंतु असममिति भी प्रदर्शित करते हैं।

शारीरिक आवरण - संघ मोलस्का के जंतुओं में उनकी देहभित्ति के वलन से बना हुआ एक लिफाफे जैसा आवरण मेंटल होता है। जो आवरण का कार्य करता है

जबकि मेंटल एक कठोर कैल्शियम युक्त कवच का स्राव भी करता है, जो संघ मोलस्का के जंतुओं का कवच उन्हें बाहरी आघातों से बचाता है।

शारीरिक विभाजन - इस संघ के जंतुओं का शरीर विभाजन सिर विसरल मास मेन्टल और पाद में विभाजित होता है।

प्रचलन - इन जंतुओं में तैरने के लिए तथा प्रचलन के लिए विशेष प्रकार की संरचना होती है, जिसे मांसल पाद कहते हैं।

खण्डीभवन - संघ मोलस्का के जंतु खंड रहित होते हैं अर्थात इनका शरीर अखंडित होता है।

देहगुहा - संघ मोलस्का के जंतुओं की देहगुहा वास्तविक देहगुहा होती है, जिसे शीजोसीलोम कहते है। यह देहगुहा हृदय,उत्सर्जी अंग, जननांग के चारों ओर तक ही सीमित होती है।

पोषण - संघ मोलस्का के जंतु शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के होते हैं. इन जंतुओं की आहार नाल पूर्ण विकसित होती है।

पाचन ग्रंथियां, यकृत जबकि कुछ जंतुओं में हिपेटोपैंक्रियास भी उपस्थित होता है। बहुत से जंतुओं के मुख में रेडुला नामक संरचना भी पाई जाती है।

उत्सर्जन तंत्र - संघ मोलस्का के अधिकांश जंतुओं में उत्सर्जन के लिए मेटानेफ्रीडिया पाए जाते हैं।

परिसंचरण तंत्र - संघ मोलस्का के अधिकतर प्राणियों में बंद प्रकार का परिसंचरण तंत्र पाया जाता है, किंतु कुछ प्राणियों में खुला परिसंचरण तंत्र भी उपस्थित होता है।

क्योंकि उन जंतुओं में रक्त अवकाश उपस्थित होते हैं। जंतुओं में हृदय विकसित होता है, हृदय दो या तीन कोष्ठीय

(अर्थात 2 या 1 अलिन्द और एक निलय) उपस्थित होता है। इन प्राणियों में शिरा और धमनी तंत्र सुविकसित प्रकार का होता है।

स्वसन तंत्र - संघ मोलस्का के जंतुओं का शवसन तंत्र भी विकसित प्रकार का होता है। जो जंतु जल में रहते हैं उनके शवसन गिल्स तथा

ज़मीन पर रहने वाले जंतुओं में  फेफड़े या पल्मोनरी कोष उपस्थित होते हैं, जबकि उभयचर प्राणियों में दोनों प्रकार की संरचना पाई जाती हैं।

तंत्रिका तंत्र - इन जंतुओं में तंत्रिका तंत्र के रूप में युग्मित और अयुग्मित गैगलिया संयोजक और तंत्रिकायें उपस्थित होती हैं।

संवेदी अंग - संघ मोलस्का के जंतुओं में संवेदी अंग के रूप में टेंटाकल्स, नेत्र तथा संतुलन पट्टी होती है, जो स्वाद तथा गंघ संवेदी अंग होते हैं।

प्रजनन तंत्र - संघ मोलस्का के जंतु एकलिंगी जबकि कुछ जंतु द्विलिंगी भी होते हैं। जंतुओं में जनन अंग अयुग्मित या युग्मित होते हैं।

परिवर्धन - इन जंतुओं में निषेचन बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार का होता है। जबकि परिवर्धन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रकार का होता है, इसमें प्लावी लार्वा अवस्था पाई जाती है।

संघ मोलस्का का वर्गीकरण Classification of phylum Mollusca

संघ मोलस्का का वर्गीकरण कवच की उपस्थिति तथा पाद के आधार पर निम्नलिखित 6 वर्गों में किया गया है:-

1. वर्ग मोनोप्लेकोफोरा Monoplacophora

सामान्य लक्षण

  1. इस वर्ग के अधिकांश जंतु प्रशांत महासागर में पाए जाते हैं, तथा इनके लक्षण ऐनेलिडा संघ से मिलते जुलते हुए हैं।
  2. इस वर्ग के प्राणियों के शरीर पर मेंटल और विशेष संरचना वाला कवच पाया जाता है।
  3. प्राणियों के मुख पर रेडुला नामक संरचना पाई जाती है, तथा इनकी आंत कुंडलित प्रकार की होती है।
  4. प्राणियों में प्रचलन के लिए मोटा मांसल पाद उपस्थित होता है, जो प्रचलन के लिए,तैरने के लिए उपयुक्त होता है।
  5. इन प्राणियों का हृदय 3 कोष्ठीय जिसमें दो आलिंद और एक निलय पाया जाता है।

उदाहरण - निओपिलाइना

2.  वर्ग एमफीन्यूरा Amphineura

सामान्य लक्षण 

  1. इस वर्ग के प्राणी निम्न श्रेणी के प्राणी होते हैं, जो अधिकतर समुद्री होते हैं।
  2. इन प्राणियों का शरीर के ऊपर का आवरण, कवच  कैल्शियम युक्त कंटीकाओं से मिलकर बना हुआ होता है।
  3. इस वर्ग के प्राणियों के जंतुओं का शरीर चपटा, अंडाकार और छोटा होता है जो एकलिंगी होते हैं।
  4. इन प्राणियों में प्रचलन के लिए अधर तल पर एक माशल पाद होता है।
  5. प्राणियों के परिवर्धन मे ट्रॉकोफॉर लारवा अवस्था पाई जाती है।
  6. यह प्राणी वाहय निषेचन क्रिया करते है।

उदाहरण - निओमेनिया

3.  वर्ग सकेफोपोडा Scaphopoda

सामान्य लक्षण

  1. इस वर्ग के अधिकांश प्राणी समुद्र जलीय होते हैं।
  2. प्राणियों का शरीर लंबा बेलनाकार तथा सममिति द्वीपाशर्व  होती है।
  3. इन प्राणियों में मेंटल और कवच नालाकार आकृति का पाया जाता है। जबकि इनका कवच हांथी के दांतो के समान दोनों ओर से मुड़ा हुआ रहता है।
  4. इन प्राणियों के मुख पर चारों ओर स्पर्शक पाए जाते हैं जो संवेदी अंग की तरह कार्य करते हैं।
  5. इस वर्ग के प्राणियों में गिल्स की अनुपस्थिति होती है, जबकि ये एक लिंगीप्राणी होते हैं।
  6. इन प्राणियों के जीवन में ट्रकोफोर और वेलीजर लारवा अवस्था देखने को मिलती हैं।

उदाहरण - डेंटलियम

4.  वर्ग गैस्ट्रोपोडा Gastropoda

सामान्य लक्षण

  1. इस वर्ग के प्राणी समुद्री जलीय स्वच्छ जलीय तथा कुछ नम मिट्टी में रहने वाले होते हैं।
  2. प्राणियों के शरीर के अगले हिस्से पर सिर नेत्र तथा मुख पर रेडुला नामक सरचना उपस्थित होती है।
  3. इस वर्ग के कुछ प्राणियों में कवच अनुपस्थित होता है, जबकि कुछ प्राणियों में  कुंडलित प्रकार का कवच पाया जाता है।
  4. प्राणियों में शवसन मुख्यत: गिल्स के द्वारा या पलमोनरी कोष के द्वारा होता है।
  5. यह प्राणी एकलिंगी या द्विलिंगी हो सकते हैं, जबकि जीवन में ट्रॉकोफॉर और वेलीजर प्रावस्था और शिशु अवस्था में पाई जाती हैं।

उदाहरण - पाइला

5.  वर्ग बाइवालिविया Bivalvia

सामान्य लक्षण

  1. इस वर्ग के अधिकांश प्राणी समुद्री जलीय होते हैं, किंतु कुछ प्राणी स्वच्छ जल में भी रहते हैं।
  2. प्राणियों का मेंटल पतला होता है, जबकि शरीर दो कपाटों के बने हुए कवच में बंद रहता है।
  3. प्राणियों के सिर पर नेत्र, टेंटाकल्स तथा रेड्यूला नामक संरचना उपस्थित नहीं होती।  
  4. स्वसन चपटे क्लोम गिल के द्वारा होता है।
  5. इस वर्ग के प्राणियों में तंत्रिका तंत्र पाया जाता है, जो 3 जोड़ी गुच्छक से मिलकर बना होता है।
  6. इन प्राणियों के जीवन में ट्रोकोफोर लारवा अवस्था तथा ग्लोकीडियम लारवा अवस्था पाई जाती है.

उदाहरण - योल्डिया

6.  वर्ग  सिफेलोपोडा Cephalopoda

सामान्य लक्षण

  1. इस वर्ग के प्राणी समुद्र जलीय होते हैं।
  2. इस वर्ग के सभी प्राणी समुद्र में तैरते हुए रहते हैं, और विकसित होते हैं।
  3. प्राणियों का सिर बड़ा होता है, जिस पर नेत्र स्पष्ट पाए जाते हैं।
  4. प्राणियों का तंत्रिका तंत्र विकसित और यह एकलिंगी प्राणी होते हैं।
  5. मुख पर रेडुला उपस्थित तथा परिवर्धन प्रत्यक्ष प्रकार का होता है।

उदाहरण - नॉटीलस 

दोस्तों इस लेख में आपने संघ मोलस्का के लक्षण तथा विशेषताएँ पड़ी। आशा करता हुँ, यह लेख आपको अच्छा लगा होगा।

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